
पिलखाभूमि सूरजपुर (अफ़रोज़ खान)
छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित कुदरगढ़ महोत्सव में घरेलू गैस सिलेंडरों के कथित अवैध उपयोग पर पिलखा भूमि द्वारा प्रमुखता से खबर प्रकाशित किए जाने के बाद प्रशासन और संचालकों में हड़कंप मच गया है। खबर का असर इतना व्यापक रहा कि देखते ही देखते महोत्सव परिसर से वे तमाम लाल रंग के घरेलू सिलेंडर रहस्यमयी ढंग से गायब हो गए हैं, जो कल तक नियमों को ठेंगा दिखा रहे थे।

तस्वीर बदली, पर सवाल बरकरार
महोत्सव स्थल का नजारा अब पूरी तरह बदल चुका है। जहां कल तक घरेलू गैस सिलेंडरों की लंबी कतारें लगी थीं, वहां अब पारंपरिक लकड़ी के चूल्हे सुलगते नजर आ रहे हैं। खाना पकाने के लिए अब लकड़ियों का सहारा लिया जा रहा है। इस अचानक आए बदलाव ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
जल्दबाजी या डर: यदि सिलेंडरों का उपयोग नियम विरुद्ध नहीं था, तो खबर चलते ही उन्हें इतनी हड़बड़ी में क्यों हटाया गया?
साक्ष्य मिटाने की कोशिश: क्या यह प्रशासन की त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई है या फिर जांच से बचने के लिए सबूतों को ठिकाने लगाने की एक कोशिश?

स्थानीय लोगों में चर्चा का विषय
मेले में आए श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों के बीच यह मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लोगों का कहना है कि मीडिया की पैनी नजर और ‘पिलखा भूमि’ की रिपोर्टिंग ने जिम्मेदार अधिकारियों की नींद उड़ा दी। आनन-फानन में की गई इस ‘साफ-सफाई’ से यह तो स्पष्ट हो गया है कि दाल में कुछ काला जरूर था।
बड़ा सवाल: > क्या प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराएगा कि सार्वजनिक आयोजन में घरेलू सिलेंडरों की खेप कैसे पहुंची? या फिर गैस की जगह लकड़ी जलते ही इस पूरे मामले की फाइल को ‘सब कुछ ठीक है’ कहकर बंद कर दिया जाएगा?
फिलहाल, महोत्सव में गैस की लौ तो बुझ गई है, लेकिन व्यवस्था पर उठे सवालों की आंच अभी भी गर्म है।








