
पिलखाभूमि सूरजपुर (अफ़रोज़ खान)
जहां आस्था का संगम होना था वहां अब सवालों का धुआं उठ रहा है। सूरजपुर का प्रसिद्ध कुदरगढ़ महोत्सव इस समय भक्ति के लिए नहीं बल्कि प्रशासन की तानाशाही और नियमों की सरेआम अनदेखी के लिए सुर्खियों में है।
एक तरफ आम आदमी एक अदद घरेलू गैस सिलेंडर के लिए 20-20 दिनों तक एजेंसियों के चक्कर काट रहा है, वहीं दूसरी ओर महोत्सव के पंडालों में घरेलू सिलेंडरों की ऐसी नुमाइश लगी है जैसे नियम सिर्फ गरीब जनता के लिए बने हों।

जनता लाइन में महोत्सव वीआईपी डिजाइन में?
जिले की स्थिति यह है कि आम नागरिक के घर का चूल्हा बुझने की कगार पर है। गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें हैं, वेटिंग लिस्ट हफ्तों लंबी है। लेकिन कुदरगढ़ महोत्सव में प्रशासन ने जैसे ‘जादुई चिराग’ घिसा और भारी तादाद में घरेलू सिलेंडर प्रकट हो गए।
बड़ा सवाल: क्या व्यावसायिक गतिविधियों में घरेलू सिलेंडर का उपयोग प्रतिबंधित नहीं है? क्या प्रशासन खुद कानून से ऊपर है?
खाद्य अधिकारी का अजीबोगरीब तर्क
अपनों को रेवड़ी जनता को डंडा
जब इस धांधली पर सवाल उठे तो जिला खाद्य अधिकारी ने जो दलील दी वह किसी चुटकुले से कम नहीं है। उनका कहना है कि— महोत्सव में उपयोग हो रहे सिलेंडर अधिकारियों ने अपने नाम से बुक किए थे।
अब जनता पूछती है:–क्या अधिकारियों के पास सुपर पावर है कि उन्हें 15-20 दिन इंतजार नहीं करना पड़ता?
क्या सरकारी नियम अधिकारियों को अपना व्यक्तिगत कोटा सार्वजनिक आयोजन में खपाने की अनुमति देते हैं?
अगर बुकिंग सही है तो रसीदें सार्वजनिक करने में प्रशासन के हाथ-पांव क्यों फूल रहे हैं?

आक्रोश की आग: नियम सिर्फ आम आदमी के लिए
स्थानीय लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का कहना है कि अगर कोई छोटा दुकानदार गलती से भी घरेलू सिलेंडर का उपयोग कर ले, तो प्रशासन की टीम चील की तरह झपट्टा मारकर जुर्माना ठोक देती है। लेकिन जब वही काम ‘कलेक्टर साहब की नाक के नीचे’ होता है, तो सब आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं।
ये हैं जनता की सीधी मांगें:
जांच का चाबुक: महोत्सव में इस्तेमाल हर एक सिलेंडर के सीरियल नंबर की जांच हो।
पारदर्शिता: अधिकारियों द्वारा की गई ‘कथित बुकिंग’ की रसीदें मीडिया और जनता के सामने रखी जाएं।
समान कानून: नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले जिम्मेदार अफसरों पर तत्काल दंडात्मक कार्रवाई हो।
निष्कर्ष: यह सिर्फ एक महोत्सव का मामला नहीं है, यह प्रशासनिक जवाबदेही और नैतिकता का सवाल है। कुदरगढ़ महोत्सव की चकाचौंध के पीछे नियमों का जो ‘अंधेरा’ है, वह सूरजपुर प्रशासन की कार्यप्रणाली पर एक गहरा धब्बा है। अब देखना यह है कि ‘साहब’ इस पर क्या सफाई देते हैं या फिर चुप्पी साधकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं।








