
निलंबन खत्म कर दी गई थी उसी स्कूल में पोस्टिंग, 24 घंटे में पलटाजपुर फैसला अब पारदर्शिता और जवाबदेही पर घिरा विभाग
पिलखाभूमि सूरजपुर (अफ़रोज़ खान)
जिले का शिक्षा विभाग इन दिनों फैसलों की ऐसी प्रयोगशाला बन गया है, जहां नियमों से ज्यादा हालात का दबाव असर दिखा रहा है। ताजा मामला नर्मदापुर-भुवनेश्वरपुर के प्रधान पाठक निरंजन प्रसाद कुशवाहा से जुड़ा है, जिन पर नशे की हालत में स्कूल पहुंचने का गंभीर आरोप लगा था। पहले विभाग ने उन्हें निलंबित किया, 2 मार्च को आरोप पत्र जारी कर जवाब मांगा लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए।
18 मार्च 2026 को जारी आदेश में विभाग ने शिक्षक के जवाब को आधार बनाकर न सिर्फ निलंबन समाप्त कर दिया, बल्कि चेतावनी देकर उसी स्कूल में दोबारा पदस्थ कर दिया। हैरानी की बात यह रही कि निलंबन अवधि को भी कर्तव्य अवधि मान्य कर दिया गया-मानो मामला कभी गंभीर था ही नहीं।लेकिन जैसे ही यह आदेश सामने आया तों समाचारों की सुर्खियों में शामिल होने के बाद लोगों का आक्रोश बढ गया कि बच्चों के भविष्य से जुड़े इस मामले में इतनी नरमी पर सवाल उठे तो विभाग ने 19 मार्च को नया आदेश जारी कर बहाली को निरस्त कर दिया।यहां भी कहानी में नया मोड़ आया-जारी पीडीएफ में दस्तावेज 20 मार्च का दिख रहा है, जिससे आदेश की मंशा और पारदर्शिता दोनों पर संदेह गहराने लगा है।इसी के साथ एक और अहम पहलू सामने आता है-शिक्षा विभाग जहां शिक्षकों पर त्वरित कार्रवाई करता है, वहीं अपने ही तंत्र में बैठे अधिकारियों की भूमिका पर उतनी सख्ती क्यों नहीं दिखती। लगातार सामने आ रही निगरानी की खामियों के बावजूद विभाग की चुप्पी सवालों को और गहरा रही है।
सवालों के घेरे में विभागीय फैसले
इसपूरे घटनाक्रम ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं कि इतने गंभीर आरोप के बावजूद निलंबन समाप्त करने का आधार क्या था,क्या विभागीय जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है और गलत फैसले लेने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं होती साथ ही क्या जनआक्रोश और मीडिया के दबाव के बाद ही निर्णय बदले जाते हैं.?
भरोसे पर चोट, बच्चों के भविष्य पर असर
शिक्षा व्यवस्था सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, भरोसे की बुनियाद होती है। जब फैसले ही अस्थिर और विरोधाभासी दिखें, तो इसका सीधा असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिनके भविष्य की जिम्मेदारी इसी तंत्र के कंधों पर है।सूरजपुर में अब यह चर्चा आम है-क्या यहां फैसले नियमों से होते हैं या परिस्थितियों के दबाव में बदलते रहते हैं, लगातार बदलते आदेश और अस्पष्ट निर्णय प्रक्रिया यह संकेत दे रही है कि शिक्षा विभाग को अब आत्ममंथन की जरूरत है-ताकि आने वाले समय में फैसले स्थिर, पारदर्शी और विद्यार्थियों के हित में हों, न कि विवादों के केंद्र बनते रहें।
कुल मिलाकर, जरूरत अब सिर्फ फैसले लेने की नहीं, बल्कि सही, पारदर्शी और समयबद्ध फैसले लेने की है,ताकि शिक्षा व्यवस्था भरोसे की कसौटी पर खरी उतर सके और ऐसे विवाद दोबारा जन्म न लें।








