लोकतंत्र में वोट मांगते वक्त जो सिर जनता के चरणों में झुकते हैं, शहंशाहियत मिलते ही वही पैर जनता के सिर के बराबर टेबल पर तन जाते हैं। मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले के मोरगा अंचल से आई एक तस्वीर ने आज सत्ता के इसी रसूखदार चेहरे को बेनकाब कर दिया है। मौका था ‘सुशासन तिहार’ का, जहां ढिंढोरा तो जनता की भलाई का पीटा जा रहा था, लेकिन मंच पर जो नजारा दिखा, उसने सुशासन के दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दीं।
क्या हुआ मोरगा के उस सरकारी मंच पर?
तस्वीरें गवाह हैं कि मंच पर मुख्य अतिथि के तौर पर विराजमान सूबे के रसूखदार मंत्री रामविचार नेताम साहब बड़े आराम से कुर्सी पर पसरे हुए हैं और उनके दोनों पैर सामने रखी टेबल पर टिके हैं। वहीं दूसरी तरफ, सुशासन की उम्मीद लेकर आए वनांचल के भोले-भाले ग्रामीण और महिलाएं नीचे बिछी टाट-पट्टी (दरी) पर जमीन पर बैठे हैं।
गंभीर बात यह है कि मंत्री जी के ठीक सामने बैठे लोग उनके जूतों की तरफ मुंह करके बैठने को मजबूर थे। सरकारी अमला मौन था और चाटुकारिता में लीन नेता इस दृश्य को सहज मानकर ताली बजा रहे थे।
जनता में उबाल, उठ रहे हैं तीखे सवाल
सोशल मीडिया पर इस फोटो के आते ही पूरे वनांचल में आक्रोश की लहर है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे क्षेत्र की जनता के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार बताया है:
क्या यही है बदलता छत्तीसगढ़?: ग्रामीणों का पूछना है कि क्या आदिवासियों और गरीबों को जमीन पर बैठाकर, उनके सामने पैर पसारना ही सरकार का असली ‘सुशासन’ है?
आयोजकों की रीढ़ पर सवाल: कार्यक्रम के कर्ता-धर्ताओं में इतना साहस नहीं था कि वे माननीय को टोक सकें कि साहब, सामने आपकी ‘जनता जनार्दन’ बैठी है, जरा मर्यादा का ख्याल रखिए।
✒️ पिलखा भूमि (संपादकीय टिप्पणी): ‘हुजूर, कुर्सियां जनता की खैरात हैं, बपौती नहीं!‘
जब सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है, तो इंसान को ज़मीन पर बैठे लोग बौने नजर आने लगते हैं। मोरगा की यह वायरल तस्वीर छत्तीसगढ़ के किसी एक मंत्री की नहीं, बल्कि हमारे समूचे सिस्टम के सामंती मिजाज का जीता-जागता प्रमाण है। जिस कार्यक्रम का नाम ‘सुशासन उत्सव’ रखा गया, वहां की हवा में जन-अपमान की बू आ रही है।
मंत्री जी शायद भूल गए कि जिस टेबल पर वे पैर टिकाकर बैठे हैं, वह टेबल, वह कुर्सी और वह रसूख इसी ज़मीन पर बैठी गरीब जनता के टैक्स के पैसों और उनके एक-एक वोट की बदौलत है। लोकतंत्र में जनता ‘मालिक’ होती है और प्रतिनिधि ‘सेवक’। लेकिन यहाँ सेवक हुक्मरान बनकर मेज पर पैर ताने हुए हैं और मालिक धूल चाटने को मजबूर हैं।
विपक्ष इस पर राजनीति करेगा, वो उसका काम है। लेकिन हमारा सवाल सीधे सत्ता के शीर्ष से है—क्या मंत्रियों के आचरण को लेकर कोई गाइडलाइन है या सत्ता की हनक में कुछ भी करने की खुली छूट है? वनांचल की यह भोली जनता भले ही चुप रहकर यह अपमान सह गई हो, लेकिन हुजूर याद रखिएगा, जब यही जनता ईवीएम (EVM) का बटन दबाती है, तो बड़े-बड़ों के पैर जमीन पर आ जाते हैं। जनता का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, अहंकार नहीं।
— प्रधान संपादक, पिलखा भूमि
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रायपुर/सूरजपुर:
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