
पिलखाभूमि/रामनगर (सूरजपुर)- कहते हैं कि सूरजपुर जिले में प्रशासन की कार्यशैली इतनी अद्भुत है कि यहाँ मृत व्यक्ति के श्मशान घाट पर भी ‘खेती’ लहलहा सकती है। ग्राम रामनगर की एक बेसहारा बुजुर्ग महिला दिलबासो ने आरोप लगाया है कि उनके पुरखों की पुश्तैनी धरोहर—वह श्मशान घाट जहाँ उनके पूर्वजों ने अंतिम विश्राम पाया—उसे रामकृपाल मानिकपुरी और उनके सुपुत्रों द्वारा कथित तौर पर हड़पने का प्रयास किया जा रहा है।
पुरखों की विरासत और एक बुजुर्ग की पीड़ा
घटनास्थल पर ‘पिलखा भूमि’ के प्रतिनिधि से हुई बातचीत के दौरान पीड़ित बुजुर्ग महिला दिलबासो अत्यंत भावुक हो गईं। उन्होंने अपनी पीड़ा साझा करते हुए यह व्यक्त किया कि यह जमीन उनके लिए केवल एक संपत्ति नहीं, बल्कि उनके पुरखों की आखिरी निशानी है। बुजुर्ग महिला ने अपनी उस गहरी संवेदना को साझा किया कि वे भी मरने के बाद उसी स्थान पर विश्राम पाना चाहती हैं, जहाँ उनके पूर्वजों को शांति मिली है। दिलबासो जी का आरोप है कि यदि उनकी इस पुश्तैनी धरोहर को दबंगों द्वारा हड़प लिया गया, तो उनकी यह अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो पाएगी।

पुलिस की ‘मौन साधना’ और NCR का ‘अद्भुत उपहार’
बड़े ही विनम्र भाव से हम स्थानीय थाना-विश्रामपुर की कार्यकुशलता को नमन करना चाहते हैं। कितनी शालीनता से उन्होंने FIR दर्ज करने की ‘जहमत’ उठाने के बजाय, धारा 174 B.N.S.S. के तहत एक साधारण NCR (Non-Cognizable Offence) रिपोर्ट थमाकर मामले को ‘दीवानी प्रकृति’ का बताते हुए अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है। यह ‘असाधारण’ कार्रवाई यह बताने के लिए काफी है कि प्रशासन के लिए श्मशान की पवित्रता और एक बुजुर्ग महिला की अंतिम इच्छा का मोल शायद एक कागज़ के टुकड़े से अधिक नहीं है।

प्रशासन की ‘सुप्त अवस्था’ और दबंगों का ‘साहस’
पीड़िता का आरोप है कि आरोपियों द्वारा जुताई कर धान लगाया गया, जिसके बाद स्वयं को बचाने हेतु उन्होंने भी वहां धान की फसल लगाई। इस विवादित स्थिति में थाना-विश्रामपुर ने उन्हें ‘न्यायालय की शरण’ लेने की सलाह देकर अपनी बड़ी जिम्मेदारी पूरी कर ली है। मानो पुलिस का मानना हो कि न्याय केवल अदालत का काम है, थाने में तो केवल ‘फॉर्मेलिटी’ का उत्सव मनाया जाता है। (नोट: पुलिस का यह पक्ष है कि मामला न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का है)।
SP साहब से ‘नम्र निवेदन’, शायद अब जगेगी चेतना
जब थाने से केवल NCR की पर्ची नसीब हुई, तो दिलबासो जी ने अब पुलिस अधीक्षक (SP) महोदय के दर पर अपना माथा टेका है। अब देखना यह है कि क्या पुलिस अधीक्षक महोदय का कार्यालय इस ‘शांति भंग’ के लाइव डेमो को देखने के बाद भी अपनी ‘मौन साधना’ जारी रखेगा, या फिर रामनगर में कानून का राज पुनः बहाल होगा?


पिलखा भूमि’ की ओर से प्रशासन से सीधे, तीखे सवाल:
01 यदि श्मशान घाट की जमीन पर विवाद ‘दीवानी’ है, तो फिर गरीब आदमी के पास जमीन छीनने के बाद क्या केवल भगवान के पास जाने का ही विकल्प बचा है?
02 क्या पुलिस के पास ‘दीवानी विवाद’ का बोर्ड लगा है, या फिर शांति व्यवस्था बनाए रखना अब उनकी प्राथमिकता सूची से बाहर हो चुका है?
03 अगर आज प्रशासन इस विवाद को ‘दीवानी’ कहकर पल्ला झाड़ रहा है, तो कल जब वहां दो गुटों के बीच खून बहेगा, तब क्या पुलिस इसे भी ‘दीवानी’ ही कहेगी?
04 एक बेसहारा महिला अपनी पुश्तैनी जमीन के लिए दर-दर भटके, तो उसे ‘अदालत’ जाने की सलाह देने वाले पुलिसकर्मी क्या यह भी बताएंगे कि तब तक उसके जीने की व्यवस्था कौन करेगा?

‘पिलखा भूमि’ की एक छोटी सी टिप्पणी:
हम पुलिस प्रशासन की इस धैर्यपूर्ण निष्क्रियता की सराहना करते हैं! काश, इसी धैर्य का आधा हिस्सा भी पीड़ित बुजुर्ग महिला की सुनवाई में खर्च किया गया होता। वैसे भी, सूरजपुर में न्याय मिलना इतना भी आसान नहीं, जितनी आसानी से यहाँ श्मशान पर कब्जा हो जाता है और पुलिस महकमा NCR की पर्ची थमाकर पल्ला झाड़ लेता है।
डिस्क्रिप्शन
“एक बेसहारा विधवा, पुरखों की पवित्र धरोहर, और जमीन हड़पने पर आमादा लोगों का तंत्र! रामनगर की दिलबासो जी की आंखों में आंसू हैं, लेकिन प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल। क्या श्मशान की जमीन पर फसल उगाना ही समाधान है? इस मामले में पुलिस प्रशासन का कोई भी पक्ष या बयान स्वागत योग्य है। पढ़िए ‘पिलखा भूमि’ की यह विशेष रिपोर्ट।”

“खबर का यह भावनात्मक अंश पीड़िता और हमारे संवाददाता के बीच हुई बातचीत पर आधारित है।”












