पिल्खा भूमिसूरजपुर / प्रतापपुर वनपरिक्षेत्र: सूरजपुर वनमंडल के प्रतापपुर क्षेत्र में कैम्पा (CAMPA) निधि और वृक्षारोपण कार्यों की ‘माप पुस्तिका’ (MB) को छुपाने के लिए शुरू हुआ कागजी बाजीगरी का खेल अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। “पिल्खा भूमि” के पहले खुलासे के बाद प्रशासनिक गलियारों और वन विभाग के दफ्तरों में मचे हड़कंप के बीच, आज हम वो डिजिटल और दस्तावेजी सबूत सामने ला रहे हैं, जिसके बाद संबंधित अधिकारी के पास कानूनन बचने का कोई रास्ता नहीं बचा है। कानून, विज्ञान और प्रशासनिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर ‘बैक-डेट’ में सरकारी चिट्ठियां लिखने वाले साहब खुद अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंस गए हैं।
तारीखों का खेल: ‘पिल्खा भूमि’ का अचूक डिजिटल विश्लेषण
मामले की जड़ में जब “पिल्खा भूमि” ने कूरियर, ईमेल और डाक विभाग के प्रामाणिक डिजिटल आंकड़ों की पड़ताल की, तो रेंजर कार्यालय की क्रिमिनल कॉन्स्पिरेसी (अपराधिक षड्यंत्र) और तारीखों का खेल इस प्रकार क्रमवार उजागर हुआ:
22 मई: DFO कार्यालय से आदेश जारी: प्रथम अपीलीय प्राधिकारी (DFO कोर्ट) सूरजपुर से न्यायसंगत आदेश पारित होकर आधिकारिक रूप से डिस्पैच होता है और आरटीआई के ऑनलाइन पोर्टल पर इस आदेश की कॉपी अपलोड की जाती है।
30 मई 2026: ‘पिल्खा भूमि’ का विधिक पत्र (PB/RTI/2026/05/104): पोर्टल पर आदेश अपलोड होने के बाद, “पिल्खा भूमि” के प्रधान संपादक मनीष वैद्य द्वारा 30 मई 2026 को प्रतापपुर रेंजर महोदय को बकायदा एक आधिकारिक ईमेल व व्हाट्सएप के जरिए विधिक पत्र भेजा जाता है। इस पत्र में स्पष्ट उल्लेख था कि माननीय DFO कोर्ट के आदेश के तहत प्रतापपुर वनपरिक्षेत्र के अंतर्गत कैम्पा निधि से पूर्ण हो चुके समस्त कार्यों की MB के वांछित पृष्ठों की सत्यापित प्रतियां प्रदान की जाएं। पत्र में साफ चेतावनी दी गई थी कि आरटीआई अधिनियम की धारा 7(6) के तहत अब संपूर्ण वांछित जानकारी पूर्णतः निःशुल्क (Free of Cost) 15 दिवस के भीतर अनिवार्य रूप से प्रदान की जाएं। पत्र में रेंजर द्वारा दूरभाष (मोबाइल कॉल) का उत्तर न दिए जाने और आदेश के प्रति उदासीनता बरतने का भी कड़ा विरोध दर्ज था।
5 जून 2026: रेंजर कार्यालय से पहला कूरियर रवाना: इस विधिक पत्र, ईमेल और व्हाट्सएप की प्राप्ति के बाद, रेंजर कार्यालय द्वारा 5 जून 2026 को कूरियर के माध्यम से एक पत्र आवेदक को भेजा जाता है।
8 जून 2026: पहले कूरियर की डिलीवरी और ‘बैक-डेटिंग’ का खुलासा: रेंजर द्वारा भेजा गया वह कूरियर आवेदक को 8 जून 2026 को प्राप्त होता है। जब इस लिफाफे को खोला गया, तो उसमें रखे सरकारी पत्र पर 19 मई 2026 की पिछली तारीख (Back-date) दर्ज थी! जो आदेश खुद DFO दफ्तर से 22 मई को निकला और जिसके अनुपालन हेतु ‘पिल्खा भूमि’ ने 30 मई को पत्र भेजा, उसका जवाब रेंजर ने 3 दिन पहले 19 मई को ही कैसे टाइप कर दिया? यहाँ सबसे बड़ा तार्किक सवाल यह उठता है कि यदि यह पत्र वाकई 19 मई को जारी किया गया था, तो इसे पूरे 14 से 15 दिनों तक कार्यालय में दबाकर क्यों रखा गया? प्रशासनिक नियमों के अनुसार इसे उसी दिन या एक-दो दिनों के भीतर कूरियर क्यों नहीं किया गया? साफ है कि कूरियर का डिजिटल टाइमस्टैम्प रेंजर की ‘टाइम मशीन’ का पहला लाइव सबूत था।
11 जून 2026: ‘पिल्खा भूमि’ का तीखा कानूनी प्रहार (पत्र क्रमांक: PB/2026/11): इस जालसाजी को रंगे हाथों पकड़ने के बाद, संपादक द्वारा 11 जून 2026 को रेंजर महोदय को समाचार प्रकाशन से पूर्व उनका आधिकारिक पक्ष जानने और खबर प्रकाशन हेतु पक्ष के लिए कूरियर और व्हाट्सएप के जरिए एक कड़ा विधिक नोटिस भेजा गया। इस पत्र के माध्यम से रेंजर के कृत्यों पर सीधे प्रहार करते हुए तीन गंभीर सवाल दागे गए:
शासकीय अभिलेखों में कूटकरण (Back-dating): जावक पंजी (Dispatch Register) में पिछली तारीखों में हेरफेर कर 22 मई के आदेश का जवाब 19 मई को दिखाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत ‘लोक दस्तावेजों में हेरफेर और जालसाजी’ की श्रेणी में आता है।
न्यायिक आदेश की अवहेलना व साक्ष्यों को छुपाना: DFO न्यायालय द्वारा ‘निरंक’ की दलील खारिज करने के बावजूद दोबारा भ्रामक ‘निरंक’ जवाब देना कैम्पा निधि से जुड़े मुख्य शासकीय साक्ष्यों (MB) को जानबूझकर छुपाने का कुत्सित प्रयास है।
विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन और आवेदक का उत्पीड़न: आरटीआई के अंतिम फैसले के बाद आवेदक को पुनः ‘प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष आवेदन करने’ की त्रुटिपूर्ण सलाह देना रेंजर की दुर्भावनापूर्वक (Malafide Intention) मानसिक प्रताड़ना को सिद्ध करता है। पत्र में 48 घंटे के भीतर स्पष्टीकरण और खबर प्रकाशन हेतु पक्ष देने की अंतिम चेतावनी दी गई थी।
12 जून 2026: हड़बड़ाहट में दूसरा कूरियर डिस्पैच: जैसे ही 11 जून के इस नोटिस से रेंजर को समझ आया कि उनकी ‘बैक-डेटिंग’ का खेल पूरी तरह घिर चुका है, उन्होंने अपनी गर्दन बचाने के लिए तुरंत अगले ही दिन 12 जून 2026 को एक और नया कूरियर डिस्पैच किया।
16 जून 2026: दूसरे पत्र की डिलीवरी और ‘बैक-डेटिंग’ का दूसरा खेल: रेंजर कार्यालय द्वारा 12 जून को डिस्पैच किया गया वह दूसरा बचाव पत्र जब आवेदक को 16 जून 2026 को डिलीवर हुआ, तो उसमें एक और नया कारनामा सामने आया। रेंजर साहब ने पकड़े जाने के डर से उस पत्र पर भी पीछे की तारीख यानी 29 मई 2026 (29.05.2026) अंकित कर रखी थी! यहाँ पुनः एक गंभीर तार्किक प्रश्न खड़ा होता है कि यदि यह पत्र 29 मई को तैयार होकर डिस्पैच हो चुका था, तो इसे उसी दिन या उसके अगले एक-दो दिनों के भीतर क्यों नहीं भेजा गया? इसे कूरियर करने के लिए आखिर 12 तारीख का इंतजार क्यों किया गया? 11 जून को ‘पिल्खा भूमि’ का नोटिस मिलने के बाद, ठीक अगले दिन 12 जून को कूरियर किए गए पत्र पर 29 मई की तारीख डालना खुद यह प्रमाणित करता है कि विभाग में ‘बैक-डेट’ का खेल किस स्तर पर चल रहा है और इसे ‘लिपिकीय त्रुटि’ का नाम देकर छुपाने की नाकाम कोशिश की जा रही है।
“पिल्खा भूमि” के सवाल — मौन क्यों हैं साहब?
सवाल 1: कूरियर कंपनी और डाक विभाग के कंप्यूटर सिस्टम झूठ नहीं बोलते। जब पहला पत्र 5 जून को book हुआ, तो जावक पंजी (Dispatch Register) में 19 मई की प्रविष्टि कैसे दिखाई गई? क्या रेंजर कार्यालय के पास भूतकाल में जाने वाली ‘टाइम मशीन’ है?
सवाल 2: 30 मई 2026 को जब आपको ‘पिल्खा भूमि’ का विधिक पत्र (PB/RTI/2026/05/104) ईमेल और व्हाट्सएप पर मिल चुका था, जिसमें धारा 7(6) के तहत निःशुल्क जानकारी मांगी गई थी, तो उसके बाद 5 जून को भेजे गए पत्र में 19 मई की फर्जी तारीख डालना साफ तौर पर आरटीआई कानून की समय-सीमा को दबाने और अपनी उदासीनता को छुपाने की सोची-समझी साजिश थी या नहीं?
सवाल 3: 11 जून को ‘पिल्खा भूमि’ द्वारा कड़े विधिक नोटिस (PB/2026/11) के जरिए खबर प्रकाशन हेतु पक्ष मांगते ही, 12 जून को कूरियर किए गए पत्र पर 29 मई 2026 की पिछली तारीख डालना क्या खुद अपनी पुरानी गलती को छुपाने की लिखित स्वीकारोक्ति नहीं है? इस पूरे घालमेल पर रेंजर साहब का व्हाट्सएप पर रहस्यमयी मौन क्यों है?
विभागीय जांच और कार्रवाई की तलवार
कानून के जानकारों के मुताबिक, भारतीय न्याय संरक्षक और पूर्व प्रशासनिक नियमों के तहत सरकारी दस्तावेजों में जानबूझकर कूटकरण (Forgery), बैक-डेटिंग करना और उच्च न्यायालय (DFO कोर्ट) के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करना एक गंभीर और प्रशासनिक अनुशासनात्मक कार्रवाई की श्रेणी में आता है।
आवेदक के पास मौजूद 30 मई का ईमेल व व्हाट्सएप रिकॉर्ड, 11 जून का तीखा पत्र (PB/2026/11), दोनों कूरियर रसीदें, कूरियर का डिलीवरी ट्रैकिंग डेटा (8 जून और 16 जून) और रेंजर के खुद के हस्ताक्षर वाले दोनों विरोधाभासी पत्र इस बात के अचूक प्रमाण हैं कि कैम्पा फंड के कथित तथ्यों को दबाने के लिए किस हद तक प्रशासनिक कदाचार किया गया। विधिक नोटिस मिलने के बाद भी खबर प्रकाशन हेतु पक्ष न रखना और 72 घंटे बीत जाने के बाद भी वन विभाग का मौन रहना इस बात की पुष्टि करता है कि विभाग के पास अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी तथ्य शेष नहीं हैं।
इस पूरे मामले पर “पिल्खा भूमि” का पक्ष पूरी तरह स्पष्ट है। एक जिम्मेदार और निष्पक्ष समाचार संस्थान होने के नाते हम सदैव प्रशासनिक समन्वय, शुचिता and पारदर्शिता में विश्वास रखते हैं। हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष या विभाग की छवि को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि माननीय DFO न्यायालय द्वारा पारित विधिक आदेशों का अक्षरसः अनुपालन सुनिश्चित कराना और जनहित में सूचना के अधिकार के तहत तथ्यों को सामने लाना है।
अब कूरियर और विधिक पत्रों के इन अकाट्य दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ इस पूरे गंभीर मामले की औपचारिक शिकायत माननीय वन मंत्री (छत्तीसगढ़ शासन), मुख्य वन संरक्षक (CCF) सरगुजा संभाग और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) रायपुर की चौखट पर पहुंच चुकी है, जहां संबंधित अधिकारी के खिलाफ कड़े विभागीय एक्शन और निलंबन की गाज गिरना तय माना जा रहा है।
“सच की लड़ाई जारी रहेगी, पिल्खा भूमि की खोजी मुहिम रुकने वाली नहीं है।”
प्रधान संपादक- मनीष वैद्य (पिल्खा भूमि समाचार पत्र)