
सीतापुर / पिल्खा भूमि:
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग के सीतापुर नगर पंचायत में आखिरकार वो चमत्कार हो ही गया, जिसकी उम्मीद पिछले 9 महीनों से किसी को नहीं थी। जी हाँ, पूरे 9 महीने के लंबे ‘गर्भकाल’ के बाद आखिरकार नगर पंचायत परिषद की बैठक संपन्न हो गई! इतने लंबे समय तक बैठक का अता-पता न होना इस बात का सबूत था कि विकास कार्य शायद किसी गहरी निद्रा में चले गए थे, जिससे पार्षदों और आम जनता की रातों की नींद उड़ चुकी थी।
बताया जाता है कि इस पवित्र बैठक को शुरू होने से रोकने के लिए देवलोक से लेकर भूलोक तक तमाम प्रयास किए गए होंगे, लेकिन अंततः जिला कलेक्टर के सख्त फरमान और सीतापुर तहसीलदार की मौजूदगी में यह बहुप्रतीक्षित अनुष्ठान पूरा हुआ।

सीएमओ साहब की कार्यशैली पर फूटा पार्षदों का ‘अगाध प्रेम’
बैठक शुरू होते ही माहौल ऐसा था मानो कोई भव्य स्वागत समारोह चल रहा हो। पार्षदों ने मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) साहब की प्रशासनिक कार्यकुशलता पर अपनी बेइंतिहा मोहब्बत उड़ेल दी। पार्षदों का कहना था कि सीएमओ साहब की दरियादिली देखिए कि उन्होंने 9 महीने तक बैठक न बुलाकर पार्षदों को आराम करने का पूरा मौका दिया, और परिषद की अनदेखी कर जो मनमाने कार्य किए, वे उनकी असाधारण प्रशासनिक क्षमता का परिचायक हैं!

चर्चा के इस दौर के बाद, नगर पंचायत अध्यक्ष और सभी पार्षद गणों ने पूरी विनम्रता के साथ सीएमओ साहब के विरुद्ध कड़ा निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया।
अध्यक्ष और पार्षदों की दो टूक: “भगवान मालिक है, पर जांच तो होकर रहेगी!”
इस पूरे घटनाक्रम पर जानकारी देते हुए नगर पंचायत अध्यक्ष और समस्त पार्षदों ने बड़े ही सादगी भरे अंदाज में कहा:

“हम तो सीएमओ साहब की कार्यप्रणाली से इतने अभिभूत हैं कि क्या कहें! उनके द्वारा जिस तरह से मनमाने और एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं, उससे हमारा कलेजा गदगद हो गया है। हम चाहते हैं कि उनके इस अनूठे प्रशासनिक मॉडल की उच्च स्तरीय जांच हो और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए। इसकी शिकायत लेकर हम जल्द ही सरगुजा कलेक्टर महोदय के दरबार में हाजिर होंगे।”
वहीं दूसरी ओर, सीएमओ साहब ने अपने ऊपर लगे इन ‘फूलों जैसे कोमल’ आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए खुद को दूध का धुला और पूरी तरह निर्दोष बताया है। भला ऐसे निष्कलंक अधिकारी पर कोई कैसे उंगली उठा सकता है?

पिल्खा भूमि की विशेष टिप्पणी
अधिकारियों की मेहरबानी और लोकतंत्र का यह अनोखा ‘संसार’
पिल्खा भूमि की विनम्र दृष्टि में, हमारे देश के अधिकारी वाकई धन्य हैं जो जनता के टैक्स के पैसों पर पलकर जनता को ही 9-9 महीने का ‘सन्नाटा’ तोहफे में देते हैं। जरा सोचिए, अगर हर महीने बैठक हो जाए, तो फिर अधिकारियों को फाइलों पर कुंडली मारकर बैठने और विकास कार्यों को सुलाने का मौका कैसे मिलेगा?
क्या यह विडंबना नहीं है कि जनता के नुमाइंदों को अपनी ही पंचायत में बैठक बुलाने के लिए कलेक्टर के डंडे का इंतजार करना पड़े? क्या जिला प्रशासन की नींद तभी खुलेगी जब विकास की धज्जियां पूरी तरह उड़ चुकी होंगी? और सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जनप्रतिनिधि चीख-चीखकर सीएमओ की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं, तो क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे या जनआंदोलन का इंतजार कर रहा है?

पिल्खा भूमि का सीधा सा सवाल है—आखिर ऐसे ‘अदृश्य’ अधिकारियों को संरक्षण देने वाला अदृश्य हाथ किसका है, और जनता के पैसों की इस खुली बर्बादी का हिसाब सरगुजा प्रशासन कब देगा?











