
गांधीनगर (सरगुजा): छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में इन दिनों अजब गजब करिश्मे देखने को मिल रहे हैं। लगता है कि अब अपराध की दुनिया में भी ‘फ्रीलांस’ और ‘किराए के रुतबे’ का दौर आ चुका है। खुद को एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) का शेर समझने वाले तीन महानुभाव, जिला आबकारी अधिकारी से मुफ्त की शराब और नकदी ऐंठने के चक्कर में खुद ही कानून के शिकंजे में ऐसे फंसे कि अब उनकी हेकड़ी धरी की धरी रह गई है।
छद्म-विनम्रता और व्यंग्य के आईने में पूरी दास्तान:
कहानी की शुरुआत बड़ी ही ‘विनम्रता’ से होती है। भाईसाहब! ज़रा इन शातिर कलाकारों की सादगी देखिए—इन्हें शायद यहफहमी थी कि देश का प्रशासनिक अमला और आबकारी विभाग शायद इनकी व्यक्तिगत जागीर है, जो फोन घुमाते ही हाजिर हो जाएगा।

दिनांक 27 जुलाई 2026 को जिला आबकारी अधिकारी श्री लक्ष्मीकांत गायकवाड़ के पास एक फोन आता है। फोन करने वाले महाशय ने अत्यंत ‘विनम्र’ शब्दों में खुद को एसीबी का बड़ा अधिकारी बता डाला और फरमान जारी किया कि— “बाहर से बड़े साहब निरीक्षण के लिए आ रहे हैं, उनके लिए रेस्ट हाउस में शाही दावत और तुरंत 06 बोतल शराब व कैश का इंतजाम किया जाए!”
वाह! क्या गज़ब की देशभक्ति और मेहमाननवाजी है! दूसरों के पैसों और मुफ्त की बोतलों पर भौकाल दिखाने की यह कला वाकई देश के चुनिंदा ‘प्रतिभावान’ लोगों के पास ही होती है। लेकिन बेचारे आबकारी अधिकारी भी कम खिलाड़ी नहीं निकले; उन्होंने इन महाशयों की इस ‘अमूल्य सेवा’ को स्वीकार करने के बजाय सीधे थाना गांधीनगर में रिपोर्ट दर्ज करा दी। और यहीं से इन फर्जी अफसरों के सुनहरे सपनों का गुब्बारा फुस्स हो गया।
जब पुलिस ने उतारे ‘एसीबी’ के फर्जी पर!
मामला थाने पहुंचा तो पुलिस ने भी इनकी आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ी। तकनीकी साक्ष्यों और मुखबिरों की मेहरबानी से सबसे पहले पकड़ में आए सौरभ प्रजापति।

जब पुलिस ने इनसे ‘कानून के दायरे’ में बैठकर पूछताछ की, तो इनकी सारी हेकड़ी एक ही पल में कपूर की तरह उड़ गई। सौरभ ने बड़े ही ‘सहज भाव’ से स्वीकार किया कि वे और उनके साथी राजेशपुरी गोस्वामी व रंजीत गुप्ता—तीनों मिलकर सुभाषनगर शराब भट्टी के पास मिले थे। वहीं इन तीनों बुद्धिजीवियों के ‘तेज दिमाग’ में यह क्रांतिकारी विचार आया कि— “अरे भाई, शराब के पैसे क्यों देने, क्यों न एसीबी का डर दिखाकर मुफ्त में माल और कैश झटक लिया जाए!”
व्रोकोक्ति का इससे सुंदर उदाहरण और क्या हो सकता है कि जो लोग खुद कानून की नजरों में भगोड़े और अपराधी बनने की तैयारी कर रहे थे, वे दूसरों को डराने चले थे! पुलिस ने भी इनकी इस प्रतिभा का सम्मान करते हुए इनके तीनों चेहरों को बेनकाब कर सलाखों के पीछे भेज दिया।
कानून की गिरफ्त में पधारे ‘महानुभाव’:
- सौरभ प्रजापति (आत्मज तारकेश्वर प्रजापति, उम्र 24 वर्ष) – जिन्होंने एसीबी अफसर बनने का सबसे पहले ‘सफल’ अभिनय किया था।
- राजेशपुरी गोस्वामी (आत्मज स्व. बद्रीपुरी गोस्वामी, उम्र 43 वर्ष) – जो इस योजना के मुख्य रणनीतिकारों में शामिल रहे।
- रंजीत गुप्ता (आत्मज श्री केदार प्रसाद गुप्ता, उम्र 40 वर्ष) – जिन्होंने इस पूरी योजना में भरपूर सहयोग प्रदान किया।

अब ये तीनों अपनी इस नायाब सूझबूझ के परिणाम स्वरूप पुलिस की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा रहे हैं और आगे की वैधानिक मेहमाननवाजी का इंतज़ार कर रहे हैं। इस पूरी कार्रवाई में थाना प्रभारी गांधीनगर निरीक्षक प्रवीण कुमार द्विवेदी, सहायक उप निरीक्षक अभिषेक दुबे, आरक्षक विकास सिंह, अमृत सिंह और घनश्याम देवांगन की टीम ने अपनी पैनी नजर से इन फर्जी सूरमाओं के अरमानों पर पानी फेर दिया।
📝 पिलखा भूमि की विशेष टिप्पणी (पिलखाभूमि की कलम से)
वाह रे हमारी आधुनिक पीढ़ी के ‘मास्टरमाइंड’! मुफ्त की शराब और रौब झाड़ने का यह शॉर्टकट तरीका वाकई इतना शानदार था कि इसके अंत में हथकड़ियां और जेल की सलाखें मुफ्त मिल गईं। यह घटना उन तमाम शातिर दिमागों के लिए एक खुली चेतावनी है जो सोचते हैं कि फोन पर फर्जी धौंस जमाकर वे कानून की आंखों में धूल झोंक लेंगे।
अधिकारी महोदय की सूझबूझ और गांधीनगर पुलिस की मुस्तैदी ने यह साबित कर दिया है कि नकलची चाहे जितने भी शातिर क्यों न हों, असली खाकी के सामने उनकी हर चाल धरी की धरी रह जाती है। ‘पिलखा भूमि’ ऐसे सभी ‘फर्जी ا को सलाम करती है—कम से कम इन्होंने सरगुजा की जनता को यह हंसाने का मौका तो दे ही दिया कि मुफ़्तखोरी के चक्कर में जेल की हवा कैसे खाई जाती है!












