
अंबिकापुर: इसे विकास कहें या प्रशासनिक अंधेरगर्दी, इसका जीता-जागता नमूना अंबिकापुर के बनारस रोड पर साफ देखा जा सकता है। राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) पर स्थित साईं बाबा कॉलेज के सामने बदहाल सड़क को दुरुस्त करवाने के लिए आखिरकार जनता और युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरकर चक्का जाम करना पड़ा। वाह रे हमारा सिस्टम, जहाँ बिना चक्का जाम किए अफसरों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती!
विकास की पोल खोलती सड़क और सोता हुआ प्रशासन
यहाँ के हालात ऐसे हैं कि सड़क कम और कोई खूनी गड्ढा ज्यादा लगती है। वर्षों से जर्जर इस मार्ग के कारण आम जनता, कॉलेज जाने वाले मासूम छात्र-छात्राओं और राहगीरों का जीवन नर्क बन चुका है। धूल फांकते राहगीर और गाड़ियों के पार्ट्स तोड़ते गड्ढे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि जिम्मेदार विभागों के अधिकारियों को जनता की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं है। साहब लोग शायद किसी बड़े हादसे के इंतजार में हैं, तभी तो इतनी खस्ताहाल सड़क होने के बावजूद कुंभकर्णी नींद से जागने का नाम नहीं ले रहे हैं।

युवा कांग्रेस सरगुजा (ग्रामीण) के ब्लॉक अध्यक्ष सतीश घोष के नेतृत्व में क्षेत्रवासियों ने जब एनएच का घेराव किया, तब जाकर प्रशासन की नींद टूटने का नाटक शुरू हुआ। प्रदर्शनकारियों ने दोटूक चेतावनी दे डाली है कि यदि जल्द सड़क का निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो यह आंदोलन और उग्र होगा।
पिलखा भूमि की टिप्पणी
“धन्य है हमारे क्षेत्र का प्रशासनिक अमला और विकास के दावे करने वाले नुमाइंदे! इन्हें देखकर तो ऐसा लगता है कि जर्जर सड़कें और गड्ढे ही इस आधुनिक विकास के असली आभूषण हैं। कॉलेज के सामने से गुजरने वाले छात्र-छात्राएं रोज जान हथेली पर लेकर निकलते हैं, लेकिन हमारे साहबों की एसी गाड़ियों के झटके शायद इन गड्ढों तक पहुँच नहीं पाते। जब तक जनता खुद धूप में बैठकर सड़क पर चक्का जाम न करे, तब तक फाइलों में सड़कें मक्खन की तरह चिकनी ही दिखती रहेंगी। वाह रे सुशासन!”

पिलखा भूमि के सवाल
- अधिकारियों की संवेदनाएं गिरवी कहाँ रखी हैं? जब सालों से बनारस रोड पर आम जनता धूल और कीचड़ फांक रही थी, तब क्या जिम्मेदार अधिकारियों की आँखें सिर्फ तब खुलती हैं जब जनता सड़क पर चक्का जाम करती है?
- मेंटेनेंस के बजट का क्या शिफ़्टिंग हो रहा है? राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव और मरम्मत के नाम पर आने वाला जनता के गाढ़े पसीने का टैक्स आखिर किस गुप्त तिजोरी में समा रहा है?
- क्या बिना आंदोलन के इस तंत्र में फाइलें नहीं हिलतीं? क्या लोकतंत्र में जनता को अपने बुनियादी हक (रोटी, कपड़ा और कम से कम एक अदद चलने लायक सड़क) के लिए भी हर बार चक्का जाम का ही हथियार उठाना पड़ेगा?











