
बाबा साहेब की जयंती पर RTI कानून का मखौल; 14 में से 5 अर्जियों पर अफसरों का सुसाइडल’ जवाब— हमारे पास जानकारी नहीं है / संपादक मनीष वैद का सवाल— (कागज नहीं हैं तो क्या भ्रष्टाचार के सबूत जला दिए गए?)
पिलखा भूमि प्रतापपुर/सूरजपुर (14 अप्रैल): आज जब पूरा देश बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर उनके दिए संवैधानिक अधिकारों का जश्न मना रहा है, ठीक उसी समय सूरजपुर जिले के प्रतापपुर वन परिक्षेत्र के अधिकारी लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने में मस्त हैं। ‘पिलखा भूमि’ के प्रधान संपादक मनीष वैद द्वारा लगाई गई 14 आरटीआई (RTI) ने विभाग के उस ‘काले सच’ को उजागर कर दिया है, जिसे अब तक फाइलों में दफन समझा जा रहा था। विभाग ने लिखित में स्वीकार किया है कि उनके पास करोड़ों के कामों का कोई दस्तावेजी प्रमाण या फोटोग्राफ मौजूद नहीं है।

🚫 अंधेर नगरी, चौपट राजा: बिना बिल-वाउचर के बंट गई मलाई!
विभाग द्वारा दिए गए जवाब (पत्र क्रमांक 1087, 1067, 1065, 1061) किसी बड़े घोटाले की चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं। जनसूचना अधिकारी ने आधिकारिक तौर पर लिख कर दिया है कि ‘नरवा विकास’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के फोटोग्राफ, मस्टर रोल और भुगतान संबंधी बैंक ट्रांजेक्शन आईडी ‘निरंक’ (Zero) हैं।

📄 लेटर क्रमांक 1063 का नया पैंतरा: जानकारी को बताया ‘अस्पष्ट’
विभाग की बेशर्मी का आलम यह है कि पत्र क्रमांक 1063 (दिनांक 11.04.2026) के माध्यम से एक और आवेदन को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि चाही गई जानकारी ‘अस्पष्ट’ है। संपादक मनीष वैद ने जब जनवरी 2024 से जनवरी 2026 तक हुए नरवा विकास कार्यों के GIS मैप, सीन/खसरा नंबर और वन कक्ष क्रमांक की जानकारी मांगी, तो विभाग ने पुराने अदालती फैसलों का हवाला देते हुए सूचना देने से पल्ला झाड़ लिया। सवाल यह है कि क्या वन विभाग के पास अपने ही क्षेत्र का खसरा नंबर और मैप तक मौजूद नहीं है? या फिर इन तकनीकी जानकारियों के जरिए भ्रष्टाचार की पोल खुलने का डर सता रहा है?

गंभीर सवाल जो खड़े होते हैं:
01.अगर विभाग के पास काम से पहले और बाद के फोटोग्राफ नहीं हैं, तो जियो-टैगिंग के बिना भुगतान कैसे हुआ?
02.अगर बिल और मस्टर रोल नहीं हैं, तो मजदूरों और वेंडरों को पैसा किस आधार पर दिया गया?
02.क्या GIS मैप और खसरा नंबर छुपाकर विभाग यह साबित करना चाहता है कि काम केवल कागजों पर हुआ है?

⏳ 16 अप्रैल की डेडलाइन: 9 फाइलों को ‘निगल’ गया विभाग?
14 में से केवल 5 आवेदनों पर यह ‘अतरंगी’ जवाब देकर विभाग ने अपनी गर्दन फंसा ली है। बाकी 9 आवेदनों पर विभाग की चुप्पी साफ़ बता रही है कि वहां इससे भी बड़ा ‘धमाका’ होने वाला है। 16 अप्रैल को इन आवेदनों की कानूनी मियाद खत्म हो रही है। अधिकारियों की नींद उड़ चुकी है क्योंकि उन्हें पता है कि ‘कागज नहीं है’ या ‘जानकारी अस्पष्ट है’ कहना कानूनन अपराध है और इसके लिए उन्हें राज्य सूचना आयोग में भारी जुर्माना भरना पड़ेगा।
“यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, यह संवैधानिक डकैती है” – मनीष वैद
संपादक मनीष वैद ने तीखे लहजे में कहा— “विभाग का यह कहना कि ‘रिकॉर्ड नहीं है’ या ‘जानकारी अस्पष्ट है’, असल में उनकी चोरी की स्वीकारोक्ति है। बाबा साहेब ने हमें पूछने का हक दिया और ये अफसर कह रहे हैं कि उनके पास हिसाब ही नहीं है। कल 16 तारीख बीतते ही इन ‘निरंक’ और ‘अस्पष्ट’ जवाबों की असलियत DFO सूरजपुर और सूचना आयोग के सामने खोली जाएगी।”
🔍 पिलखा भूमि की पड़ताल और विभाग का पक्ष
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद क्षेत्र में हड़कंप मचा हुआ है। सरकारी खजाने की खुली लूट के इस मामले में पिलखा भूमि ने विभाग का पक्ष जानने की कोशिश की है। संपादक मनीष वैद के द्वारा जिम्मेदार अधिकारी का पक्ष जानने के लिए व्हाट्सएप (WhatsApp) पर मैसेज भी किया गया, लेकिन अधिकारी के द्वारा अब तक कोई जवाब नहीं आया है। वर्तमान में जिम्मेदार अधिकारी ‘रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है’ का रटा-रटाया राग अलाप रहे हैं।

💥 महा-खुलासा: पिलखा भूमि की अगली किश्त में!
प्रतापपुर वन विभाग ने ‘रिकॉर्ड नहीं है’ कहकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। अब देखने वाली बातें है कि प्रतापपुर वन परिक्षेत्र के द्वारा बाकी जो 9 आरटीआई बचे हुए हैं उसमें क्या प्रतिक्रिया और जवाब आता है, खुलासा बहुत जल्द होगा।
बड़ा धमाका… बहुत जल्द! प्रतापपुर के जंगलों में दफन भ्रष्टाचार की कब्र अब खुदेगी!





