
रुद्रपुर (पिलखा भूमि ब्यूरो)।
उत्तराखंड के बंगाली समाज ने अपनी दशकों पुरानी उपेक्षा के विरुद्ध अब निर्णायक युद्ध का ऐलान कर दिया है। विश्व कवि रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती के पावन अवसर पर शुरू हुआ यह आंदोलन अब एक जन-क्रांति का रूप ले चुका है। “आरक्षण हमारा अधिकार” के बैनर तले समाजसेवी सुब्रत कुमार विश्वास के नेतृत्व में बंगाली समाज ने ऐतिहासिक अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है। 7 मई 2026 को शुरू हुए इस आंदोलन ने आज अपने तीसरे दिन और भी उग्र रूप धारण कर लिया है।
ज्ञापन का दौर खत्म, अब सीधा संघर्ष
समाजसेवी सुब्रत कुमार विश्वास ने धरने को संबोधित करते हुए कहा कि विगत कई वर्षों से सरकार और प्रशासन को सैकड़ों ज्ञापन सौंपे गए, लेकिन शासन की फाइलों में बंगाली समाज की फाइलें धूल फांक रही हैं। “अब यह समाज थक चुका है और सड़कों पर उतरकर अपना संवैधानिक हक लेकर ही दम लेगा।” धरने में उनके साथ अभिमन्यु साना भी पहले दिन से डटे हुए हैं।

रणनीति: आंशिक धरने से आमरण अनशन की ओर
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में यह धरना प्रतिदिन सुबह 10:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक चलेगा। आने वाले दिनों में रुद्रपुर, दिनेशपुर, शक्ति फार्म और आसपास के क्षेत्रों से भारी जन-समर्थन जुटने पर इसे 24 घंटे का महापड़ाव बनाया जाएगा। समाज की मांग स्पष्ट है— “संवैधानिक विसंगतियों को दूर कर बंगाली समाज को अनुसूचित जाति (SC) का अधिकार दिया जाए।” यदि शासन ने शीघ्र निर्णय नहीं लिया, तो यह आंदोलन आमरण अनशन में तब्दील हो जाएगा।

हुंकार: युवाओं और बुजुर्गों का मिला समर्थन
गोष्ठी के दौरान वरिष्ठ बंगाली नेता समीर राय और कल्याण बंगाली कल्याण समिति के अध्यक्ष दिलीप अधिकारी ने कहा कि समाज को ऊंचाई तक ले जाना अब हर बुद्धिजीवी का कर्तव्य है। डॉ. शुभ्रो चक्रवर्ती ने युवाओं की रगों में जोश भरते हुए कहा, “नई क्रांति का समय आ गया है, समाजसेवी सुब्रत विश्वास का साथ दें।” आम आदमी पार्टी के सचिव दीपक विश्वास ने भी आंदोलन को पूर्ण समर्थन देने का वादा किया है।
प्रमुख उपस्थित सदस्य
इस संघर्ष में समाज के प्रमुख स्तंभ साथ खड़े हैं, जिनमें नारायण महाजन, विद्युत सिकदर, संजय आइस, संजय सरकार, गौरव सरकार, सत्यजीत सरकार, गोपी सरकार, गौरांग सरकार, शंकर चक्रवर्ती, धीरज विश्वास, विष्णु मंडल, रंजीत, अर्जुन विश्वास, गुलाबचंद गुप्ता, शंकर सरकार पाठक, राहुल कुमार, हैप्पी रंधावा और आदिल शामिल हैं।

संपादकीय टिप्पणी: पिलखा भूमि का नजरिया
एक लंबे समय से उत्तराखंड का बंगाली समुदाय अपने वजूद और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है। जब देश के अन्य हिस्सों में इसी समुदाय को संवैधानिक लाभ मिल रहे हैं, तो उत्तराखंड में यह भेदभाव क्यों? कलम ने अपना काम किया है, अब समाज सड़कों पर है। सुब्रत विश्वास का यह संकल्प केवल एक धरना नहीं, बल्कि बंगाली समाज के स्वाभिमान की रक्षा का यज्ञ है। सरकार को अब अपनी कुंभकर्णी नींद त्यागनी होगी।
ब्यूरो रिपोर्ट: पिलखा भूमि (सत्य और न्याय की आवाज)










