
कैम्पा फंड की ‘माप पुस्तिका’ (MB) में छिपे किस वित्तीय भ्रष्टाचार को दबाने के लिए प्रतापपुर रेंजर ने अपने ही बॉस (DFO) के अदालती आदेश को पैरों तले रौंदा? “पिल्खा भूमि” का सबसे बड़ा और सनसनीखेज पर्दाफाश।
(पिल्खा भूमि): सूरजपुर: छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए रेंजरों और बाबुओं की चालाकी की कई कहानियां आपने सुनी होंगी, लेकिन सूरजपुर वनमंडल के प्रतापपुर परिक्षेत्र में जो आत्मघाती खेल खेला गया है, उसने जालसाजी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यहाँ पदस्थ जन सूचना अधिकारी सह रेंजर ने आरटीआई कानून को अपनी जागीर समझते हुए भूतकाल में जाकर सरकारी चिट्ठियां लिखना शुरू कर दिया है। मामला सीधे तौर पर कैम्पा (CAMPA) निधि के करोड़ों रुपये के कथित वित्तीय गबन को दबाने और वरिष्ठ न्यायालय के आदेश की धज्जियां उड़ाने का है।
क्या है अधिकारियों की यह कागजी बाजीगरी?
“पिल्खा भूमि” के प्रधान संपादक और प्रखर खोजी पत्रकार मनीष वैद्य ने जनवरी 2024 से जनवरी 2026 के बीच कैम्पा निधि से प्रतापपुर क्षेत्र में हुए शासकीय कार्यों के भुगतान से संबंधित Measurement Book (माप पुस्तिका-MB) की सत्यापित प्रतियां मांगी थीं। प्रतापपुर रेंजर भली-भांति जानते थे कि अगर MB के पन्ने बाहर आए, तो फर्जी भुगतानों का पूरा चिट्ठा बेनकाब हो जाएगा। इसलिए उन्होंने 11 अप्रैल 2026 को पत्र क्रमांक 1073 के माध्यम से शातिर चाल चलते हुए ‘निरंक’ (कोई जानकारी नहीं है) की झूठी रिपोर्ट थमा दी थी。

जब इस गैर-जिम्मेदाराना जवाब के खिलाफ मामला वनमण्डलाधिकारी (DFO) सूरजपुर की प्रथम अपीलीय अदालत (प्रकरण क्रमांक 81/2026) में पहुंचा, तो माननीय DFO ने रेंजर की इस भ्रामक और कानून-विरोधी ‘निरंक’ रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। DFO कोर्ट ने दिनांक 15.05.2026 को अंतिम आदेश पारित किया, जिसकी प्रमाणित प्रतिलिपि DFO कार्यालय के जावक रिकॉर्ड के अनुसार पृष्ठ क्रमांक 2883 दिनांक 22.05.2026 को आधिकारिक रूप से जारी (Dispatch) की गई थी। इस आदेश में रेंजर को कड़ा निर्देश था कि वे 15 दिनों के भीतर आवेदक को स्पष्ट और सही जानकारी उपलब्ध कराएं।
रेंजर की विधिक चोरी और बैक-डेटिंग का काला खेल (सटीक तारीखों का खुलासा):
DFO के इस कड़े हंटर के बाद प्रतापपुर रेंजर ने खुद को फंसता देख जो नया पत्र (क्रमांक 1479) आवेदक को भेजा है, उसने रेंजर कार्यालय को ही विधिक रूप से कानूनी सूली पर टांग दिया है। तारीखों का यह खेल किसी भी लोक सेवक को सीधे जेल भेजने के लिए काफी है:
पहला अकाट्य झूठ (Back-dating का खेल): DFO कोर्ट का जो मूल आदेश खुद DFO कार्यालय से दिनांक 22.05.2026 को डिस्पैच (रवाना) हुआ है, प्रतापपुर रेंजर उस आदेश के जवाब में दिनांक 19.05.2026 की पिछली तारीख डालकर पत्र जारी कर देते हैं! कानून, विज्ञान and प्रशासनिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने वाले इन रेंजर महोदय से पूछा जाना चाहिए कि जो सरकारी आदेश 22 मई को DFO कार्यालय से बाहर निकला, उसका लिखित जवाब उन्होंने 3 दिन पहले यानी 19 मई को ही कैसे टाइप कर दिया? साफ है कि जून के महीने में जब रेंजर को अपनी विधिक हार का अहसास हुआ और 15 दिन की समयसीमा बीतने का डर सताया, तो उन्होंने ‘जावक रजिस्टर’ में बैक-डेट प्रविष्टि कर यह फर्जी पत्र तैयार किया।

दूसरा झूठ (अदालत की सीधे अवहेलना): माननीय DFO ने आदेश दिया था कि ‘निरंक’ का बहाना छोड़ो और दस्तावेज सौंपो। इसके बावजूद रेंजर ने अपने नए पत्र में दोबारा धृष्टतापूर्वक लिख दिया कि ‘जानकारी निरंक है, अतः प्रदाय किया जाना संभव नहीं है’। यही नहीं, रेंजर ने पत्र के अंत में आवेदक को दोबारा ‘प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास अपील करने’ का हास्यास्पद ज्ञान बांट दिया। जिस मामले का अंतिम फैसला खुद DFO कोर्ट कर चुकी है, उसमें रेंजर द्वारा आवेदक को फिर से उसी कोर्ट में भेजने की विधिक सलाह देना यह साबित करता है कि रेंजर या तो आरटीआई कानून में पूरी तरह अनपढ़ हैं या जानबूझकर आवेदक को प्रशासनिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।
कूरियर की तारीख खोलेगी रेंजर की जेल का रास्ता:
रेंजर कार्यालय ने इस पत्र पर अपनी गर्दन बचाने के लिए तारीख भले ही ’19 मई’ डाली है, लेकिन इसे कूरियर/डाक के जरिए वास्तव में जून के महीने में रवाना किया गया है। कूरियर की डिस्पैच रसीद का असली टाइम और डाकघर का ट्रैकिंग डेटा सामने आते ही रेंजर के खिलाफ शासकीय दस्तावेजों में हेराफेरी (Forgery) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सुसंगत धाराओं (लोक दस्तावेजों में कूटकरण और जालसाजी) के तहत आपराधिक मामला दर्ज होना तय है।

विभाग का पक्ष: जालसाजी का दोहरा चक्रव्यूह और 3 दिनों का ‘रहस्यमयी मौन’
‘पिल्खा भूमि’ के विधिक प्रेस नोटिस के बाद प्रतापपुर रेंजर का असली चेहरा बेनकाब हो गया है। देखिए कैसे विभाग ने खुद को फंसाया है:
विभागीय स्वीकारोक्ति का ढोंग: रेंजर कार्यालय ने पत्र क्रमांक/1479 और 1480 (दिनांक 29-05-2026) जारी कर अपनी पुरानी बैक-डेटिंग को ‘लिपिकीय त्रुटि’ का नाम दिया है। यह एक भद्दा मजाक है; क्योंकि लिपिकीय त्रुटि केवल एक अंक की हो सकती है, न कि पूरे 10 दिन के जावक रजिस्टर की।

साक्ष्यों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ (Tampering): (मनीष वैद्य) द्वारा प्रेषित विधिक प्रेस नोटिस का कूरियर रेंजर कार्यालय में दिनांक 12 जून 2026 को आधिकारिक रूप से प्राप्त हुआ。 रेंजर की हताशा देखिए—नोटिस मिलने के बाद उन्होंने फिर से दिनांक 29 मई की बैक-डेट डालकर नया फर्जी पत्र तैयार किया! यह ‘लिपिकीय त्रुटि’ नहीं, बल्कि ‘साक्ष्यों को नष्ट करने और जावक पंजी में हेरफेर करने’ का एक क्रिमिनल कॉन्स्पिरसी (आपराधिक षड्यंत्र) है।

अल्टीमेटम के 3 दिन बाद भी विभाग की शून्य प्रतिक्रिया: इस दोहरे फर्जीवाड़े के वैज्ञानिक साक्ष्य सामने आने के बाद, ‘पिल्खा भूमि’ समाचार नेटवर्क द्वारा प्रतापपुर रेंजर के शासकीय व्हाट्सएप नंबर पर अंतिम स्मरण पत्र सह विधिक नोटिस भेजा गया था। इस नोटिस में उन्हें शाम 5:00 बजे तक लिखित या व्यक्तिगत रूप से अपना पक्ष रखने का अंतिम समय दिया गया था। आज इस अल्टीमेटम को बीते पूरे 3 दिन हो चुके हैं, लेकिन वन विभाग और रेंजर कार्यालय की तरफ से कोई प्रतिक्रिया या स्पष्टीकरण नहीं आया है। 72 घंटे से अधिक की यह निरंतर चुप्पी स्वतः प्रमाणित करती है कि जालसाजी के इस चक्रव्यूह में घिर चुके विभाग के पास अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कोई वैधानिक तथ्य या दस्तावेज शेष नहीं हैं।

पिल्खा भूमि की विशेष संपादकीय टिप्पणी:
“प्रतापपुर वनांचल में बैठा तंत्र यह न भूले कि ‘पिल्खा भूमि’ ने हमेशा जनहित और सच की लड़ाई लड़ी है। कैम्पा फंड की माप पुस्तिका (MB) के पन्नों में ऐसा कौन सा करोड़ों का काला भ्रष्टाचार और रेंजर साहब के पाप छिपे हैं, जिसे बचाने के लिए वे खुद जेल जाने की हद तक कागजी जालसाजी पर उतर आए हैं? क्या प्रतापपुर परिक्षेत्र के अधिकारी खुद को सूरजपुर वनमंडल के DFO और छत्तीसगढ़ सरकार के विधिक नियमों से ऊपर समझते हैं?
रेंजर साहब, कान खोलकर सुन लें—सरकारी पैसों की बंदरबांट को छिपाने के लिए आपकी यह कागजी बाजीगरी आपको बचाने के बजाय राज्य सूचना आयोग के कटघरे और विभागीय निलंबन की ओर ले जा रही है। ‘पिल्खा भूमि’ इस पूरे फर्जीवाड़े को न सिर्फ राज्य सूचना आयोग, रायपुर बल्कि प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) और माननीय वन मंत्री की चौखट तक ले जाएगी। जब तक कैम्पा मद के एक-एक पैसे का हिसाब और दोषियों पर दंडात्मक गाज नहीं गिरती, यह खोजी अभियान रुकने वाला नहीं है।”
पिल्खा भूमि’ के सवाल: जवाब दे वन विभाग!
सवाल: जो सरकारी न्यायिक आदेश डीएफओ कार्यालय के जावक पंजी के अनुसार 22 मई को डिस्पैच हुआ, उसका लिखित जवाब प्रतापपुर रेंजर ने 19 मई की पिछली तारीख में कैसे तैयार कर लिया? क्या रेंजर साहब के पास कोई भविष्य देखने वाली ‘टाइम मशीन’ है?
सवाल: यदि यह मात्र एक ‘लिपिकीय त्रुटि’ थी, तो ‘पिल्खा भूमि’ का विधिक नोटिस 12 जून को आधिकारिक रूप से प्राप्त होने के बाद, रेंजर कार्यालय ने दोबारा 29 मई की पिछली तारीख (बैक-डेट) डालकर नया शासकीय पत्र क्यों तैयार किया?
सवाल: कूरियर के आधिकारिक प्राप्ति समय (12 जून) और ‘पिल्खा भूमि’ द्वारा रेंजर के शासकीय व्हाट्सएप नंबर पर दिए गए शाम 5:00 बजे के अल्टीमेटम के 3 दिन बीत जाने के बाद भी वन विभाग का मौन रहना, क्या सीधे तौर पर शासकीय अभिलेखों में कूटकरण (Forgery) और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों को स्वीकार करना नहीं है?
सवाल: माननीय डीएफओ न्यायालय (प्रथम अपीलीय प्राधिकरण) के स्पष्ट आदेश के बावजूद कैम्पा फंड की मुख्य माप पुस्तिका (MB) के पन्नों को दबाकर बैठना और बार-बार जानकारी को ‘निरंक’ बताना आखिर किस बड़े वित्तीय गबन और करोड़ों की बंदरबांट को छुपाने की कोशिश है?
प्रथम संपादक- मनीष वैध (पिलखा भूमि समाचार पत्र)

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— मनीष वैद्य (प्रधान संपादक, पिलखा भूमि)












