
पिलखा भूमि पखांजूर/बीनागुंडा | क्या शासन और प्रशासन को बीनागुंडा के नक्शे से नफरत है? या फिर यहाँ रहने वाले आदिवासियों की जान की कीमत सरकारी कागजों में ‘शून्य’ हो चुकी है? नारायणपुर-कांकेर की सीमा पर स्थित बीनागुंडा से आई तस्वीरें महज एक खबर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के माथे पर बदहाली का काला टीका हैं। एक लकवाग्रस्त युवक मर्रो पददा को जब 19 किलोमीटर तक खटिया पर लादकर ले जाया गया, तो वह खटिया नहीं, बल्कि प्रशासन की संवेदनहीनता का जनाजा था।
सिस्टम को ‘लकवा’, जनता को ‘सजा’
हैरानी देखिए, 21वीं सदी के भारत में जहाँ हम डिजिटल इंडिया का ढोल पीट रहे हैं, वहाँ 3 दिन तक एक एंबुलेंस के लिए गुहार लगाई जाती है और बदले में मिलता है सिर्फ सन्नाटा। 108 सेवा का ठप होना अब इस इलाके की नियति बन चुका है। जब सरकारी पहिए जाम हो गए, तब गांव के 20 नौजवान ‘भगवान’ बनकर उतरे। तपती धूप में, पथरीले पहाड़ों को चीरते हुए 19 किलोमीटर तक इन युवाओं ने अपने कंधों पर ‘सिस्टम की नाकामियों’ को ढोया है।

BSF के जवान बने सहारा, कहाँ सो रहे थे जिम्मेदार?
छोटेबेटिया BSF कैंप के जवानों ने मानवता दिखाते हुए जो मदद की, उसने एक बार फिर साबित कर दिया कि वर्दी में अब भी दिल धड़कता है। लेकिन सवाल तो उन सफेदपोशों और साहबों से है जो ‘सड़क-बिजली-पानी’ के आंकड़ों से अपनी पीठ थपथपाते हैं। क्या इन साहबों को बीनागुंडा की उन पथरीली राहों पर चलने का साहस है, जहाँ एक मरीज की सांसें उखड़ रही थीं?
सीधे सवाल:
- सवाल: क्या सरकार की नजर में अंदरूनी गांवों के लोगों का वोट तो कीमती है, पर उनकी जान सस्ती?
- सवाल: 108 एंबुलेंस का ठेका चलाने वाली कंपनियों पर अब तक जवाबदेही तय क्यों नहीं हुई?
- सवाल: सड़क निर्माण का करोड़ों का बजट आखिर धरातल पर क्यों नजर नहीं आ रहा?

संपादकीय प्रहार: अगर इस रिपोर्ट के बाद भी पखांजूर से लेकर राजधानी तक बैठे अफसरों की कुर्सी नहीं हिलती, तो समझ लीजिए कि हमारा सिस्टम पूरी तरह ‘संवेदनहीन’ हो चुका है। यह खटिया उन दावों की पोल खोल रही है जो फाइलों में तो चमचमाते हैं, लेकिन जमीन पर ग्रामीणों के पैरों के छालों में दफन हो जाते हैं।
बाइट बॉक्स:
- महेश पददा (पुत्र): “सरकार को हमारे गांव की याद सिर्फ चुनाव में आती है, बीमारी में नहीं।”
- डॉ. सुब्रत मल्लिक: “समय पर इलाज न मिलना जानलेवा हो सकता है, सिस्टम को जागना होगा।”
- विपक्षी सुर: पक्ष-विपक्ष की बयानबाजी के बीच धरातल पर अब भी ‘खटिया राज’ कायम है।







