
प्रतापपुर/सूरजपुर: भ्रष्टाचार जब अपनी तमाम सीमाएं लांघ जाता है, तो सरकारी अधिकारी नियमों को ढाल नहीं, बल्कि अपना हथियार बना लेते हैं। प्रतापपुर वन परिक्षेत्र में वर्तमान में यही स्थिति निर्मित हो रही है। पिलखा भूमि द्वारा लगातार किए जा रहे खुलासों और 14 अलग-अलग आरटीआई के माध्यम से पूछे गए तीखे सवालों ने विभाग की चूलें हिला दी हैं। नतीजा यह है कि विभाग अब जानकारी देने के बजाय जनता और मीडिया के समक्ष ‘हास्यास्पद’ और तकनीकी बहानेबाजी परोस रहा है।
14 आरटीआई का ‘मजाक’: अधिकतर जवाब ‘निरंक’, बाकी में टालमटोल
संपादक मनीष द्वारा विभाग की कार्यप्रणाली को आईना दिखाने के लिए कुल 14 आरटीआई लगाई गई थीं। विभाग की ‘पारदर्शिता’ का तमाशा देखिए— इन 14 आरटीआई में से अधिकतर का जवाब विभाग ने ‘निरंक’ (शून्य) दिया है, जिसका सीधा निहितार्थ यही है कि क्या विभाग के पास करोड़ों के कार्यों का कोई दस्तावेजी साक्ष्य ही मौजूद नहीं है?

वहीं, जो इक्का-दुक्का जवाब दिए जा रहे हैं, उनमें ताजे पत्र (क्रमांक 1075) की तरह ‘तर्कहीन जवाब’ दिया जा रहा है कि जानकारी ‘अस्पष्ट’ है। पिलखा भूमि का सीधा प्रश्न है कि रेंजर साहब, जब आवेदन में स्पष्ट रूप से ‘कैम्पा मद’ से स्वीकृत समस्त कार्यों का विवरण, बिल और फोटो मांगे गए हैं, तो यह विभाग को ‘अस्पष्ट’ किस आधार पर प्रतीत हो रहा है?
संपादक की सीधी चुनौती: विभाग दे आदेश की प्रमाणित प्रति!
प्रतापपुर वन विभाग सूचना प्रदान करने से बचने के लिए ‘राजमंगल पाण्डेय विरुद्ध महिला एवं बाल विकास विभाग’ के एक पुराने फैसले का अत्यंत भ्रामक सहारा ले रहा है। इस पर पिलखा भूमि की ओर से विभाग को स्पष्ट चेतावनी दी गई है:
“प्रतापपुर रेंजर जिस ‘राजमंगल पाण्डेय’ आदेश की आड़ ले रहे हैं, पिलखा भूमि उन्हें चुनौती देता है कि वे उस आदेश की प्रमाणित प्रति हमें तत्काल उपलब्ध कराएं। विभाग यह स्पष्ट करे कि लोक हित में मांगे गए ‘दस्तावेज’ (जैसे बिल, वाउचर, मस्टर रोल) उस आदेश के दायरे में कैसे आते हैं? क्या विभाग भ्रष्टाचार को ढकने के लिए माननीय न्यायालय के आदेशों की गलत व्याख्या कर रहा है?”
विभाग को यह विधिक सत्य स्वीकार करना होगा कि उक्त कोर्ट केस केवल “काल्पनिक स्पष्टीकरण” देने को प्रतिबंधित करता है, किंतु विभाग के रिकॉर्ड में संधारित सरकारी दस्तावेजों को प्रदान करने से कदापि नहीं रोकता। इस केस का अनुचित संदर्भ देना केवल सूचना में विलंब करने और वित्तीय अनियमितताओं को छिपाने की एक निष्फल कोशिश है।
4 खबरें और व्हाट्सएप पर ‘मौन’
प्रतापपुर वन विभाग पर पूर्व में भी 4 खबरें प्रमुखता से प्रकाशित की जा चुकी हैं। पत्रकारिता के आदर्शों का पालन करते हुए जब इस संपूर्ण प्रकरण पर परिक्षेत्राधिकारी (रेंजर) का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो वहां भी निरुत्तरता मिली। संपादक मनीष ने रेंजर साहब को बाकायदा व्हाट्सएप पर संदेश प्रेषित कर प्रत्युत्तर मांगा, परंतु उन्होंने उत्तर देना भी उचित नहीं समझा। विभाग की यह खामोशी स्वयं प्रमाणित कर रही है कि पर्दे के पीछे बहुत कुछ छिपाया जा रहा है।

सूरजपुर डीएफओ के पास प्रथम अपील: क्या मिलेगा न्याय?
विभाग की इस मनमानी के विरुद्ध अब सूरजपुर डीएफओ (DFO) के समक्ष ‘प्रथम अपील’ प्रस्तुत की गई है। पिलखा भूमि ने अब इस संघर्ष को सीधे उच्चाधिकारियों की चौखट तक पहुँचा दिया है। अब यह देखना विचारणीय होगा कि सूरजपुर डीएफओ इस मामले में क्या निर्णय लेते हैं? क्या वे एक उत्तरदायी अधिकारी की भांति निष्पक्ष जांच कर न्याय सुनिश्चित करते हैं, या फिर अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा परोसे जा रहे इस ‘तर्कहीन जवाब’ को ही शिरोधार्य कर लेते हैं?

खुलासा अभी जारी है: अगले अंक में आएंगे चौंकाने वाले साक्ष्य!
पिलखा भूमि के पास इस पूरे प्रकरण से जुड़े कई पुख्ता और सनसनीखेज पहलू सुरक्षित हैं, जिन्हें हम अगले अंक में दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ सार्वजनिक करेंगे। साथ ही, केवल प्रतापपुर ही नहीं, बल्कि संभाग के अन्य विभागों के कारनामों की फाइलें भी अब खुल चुकी हैं। बहुत जल्द संभाग के अन्य विभागों के गंभीर मामले भी जनता की अदालत में उजागर होंगे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध पिलखा भूमि का यह अभियान निरंतर जारी रहेगा।






