
पिलखाभूमि अंबिकापुर:-जब तक जनता खुद सूबे के मुखिया के दरवाजे पर दस्तक न दे, तब तक हमारे कलेक्टोरेट के एसी कमरों में बैठे साहबों की नींद नहीं टूटती। कुछ ऐसा ही नजारा अंबिकापुर के सर्किट हाउस में देखने को मिला, जहां ‘छत्तीसगढ़ बंग समाज कल्याण समिति’ का एक मजबूत प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से सीधे रूबरू होने पहुंचा। मामला बेहद गंभीर है— सालों से पुनर्वास और शासकीय पट्टों की उम्मीद लगाए बैठे परिवारों को उनका वास्तविक हक दिलाना।प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री साय को एक कड़ा शिकायती ज्ञापन सौंपते हुए साफ कहा कि शासन के राजपत्र (24 अप्रैल 2023) में संशोधन हुए लंबा वक्त बीत चुका है।

इन संशोधित प्रावधानों का सीधा लाभ हर एक पात्र पट्टाधारी को मिलना चाहिए था, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। समाज ने मांग की है कि प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों को इसके लिए तत्काल कड़े और स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं, ताकि दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर थक चुके लोगों को न्याय मिल सके।इस महत्वपूर्ण मुलाकात में बंग समाज की ओर से प्रदेश अध्यक्ष रामू घोष, पूर्व अध्यक्ष विजय व्यापारी, प्रदेश संरक्षक शिव शंकर दास, सुशांत घोष, गोपाल हालदार और जगदीश मंडल सहित अन्य प्रमुख पदाधिकारी पूरी मुस्तैदी से डटे रहे।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भी प्रतिनिधिमंडल की पूरी बात को ध्यानपूर्वक सुना और साफ शब्दों में आश्वस्त किया कि किसी के साथ भी अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और जल्द ही इस पर उचित कार्रवाई होगी।

📰 पिलखाभूमि की बेबाक टिप्पणी और तीखे सवाल
“आश्वासन की घुट्टी तो मिल गई, पर जमीनी अमल कब?”
पिलखाभूमि का साफ मानना है कि मुख्यमंत्री का आश्वासन स्वागत योग्य है और बंग समाज का अपनी लड़ाई के लिए सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचना उनकी एकजुटता को दिखाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जो नियम खुद सरकार ने राजपत्र में प्रकाशित कर दिए हैं, उन्हें लागू करवाने के लिए भी जनता को मुख्यमंत्री के चक्कर क्यों काटने पड़ रहे हैं? क्या हमारे जिलों के कलेक्टर और राजस्व विभाग के अफसर बिना डंडे के काम करना भूल चुके हैं?
इस पूरे मामले पर ‘पिलखा भूमि’ प्रशासन से सीधे 2 सवाल पूछता है:
सवाल नंबर 1: जब 24 अप्रैल 2023 के राजपत्र में प्रावधान साफ-साफ संशोधित कर दिए गए थे, तो पिछले इतने समय से जिला स्तर के अधिकारी इन फाइलों को दबाकर क्यों बैठे थे? इसकी लेत-लतीफी की जिम्मेदारी किस पर तय होगी?

सवाल नंबर 2: मुख्यमंत्री के इस नए आश्वासन के बाद क्या सरगुजा और सूरजपुर सहित तमाम जिलों के कलेक्टर कोई समय-सीमा तय करके पट्टाधारियों को उनका हक सौंपेंगे, या फिर यह मामला भी ‘आश्वासन बाबू’ के भरोसे ठंडे बस्ते में चला जाएगा?











