
पिलखाभूमि पखांजूर (संवाददाता किशोर बाला)
वन विभाग की नाकामी: आग की लपटों में झुलसता जंगल, बेघर हुए मासूम परिंदे।
छत्तीसगढ़ के पखांजूर इलाके से इस वक्त की बड़ी खबर आ रही है, जहाँ बांदे के पश्चिम परिक्षेत्र के जंगलों में भीषण आग ने तांडव मचा रखा है। इस आगजनी में जहाँ करोड़ों की वन संपदा जलकर खाक हो रही है, वहीं बेजुबान पशु-पक्षी बेघर हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस आपदा के बीच फॉरेस्ट विभाग की गहरी नींद नहीं टूट रही है। आखिर सरकार के ‘जंगल बचाओ’ के नारों की हकीकत क्या है? देखिए बांदे से हमारे संवाददाता किशोर बाला की यह विशेष रिपोर्ट।
बांदे के पश्चिम परिक्षेत्र का जंगल इस वक्त आग के हवाले है। हर तरफ धुआं और राख का मंजर है। सरकारी दावों की पोल खोलती ये तस्वीरें विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं।
विभाग की निष्क्रियता: आग लगने के घंटों बाद भी वन विभाग का कोई भी जिम्मेदार कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचा। ऐसा प्रतीत होता है कि विभाग केवल कागजों पर जंगल बचा रहा है।
जीव-जंतुओं पर संकट: भीषण गर्मी के बीच इस आग ने कई दुर्लभ पक्षियों के घोंसले और वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है।
एक तरफ सरकार ‘वृक्षारोपण’ और ‘पर्यावरण संरक्षण’ के लिए करोड़ों का बजट आवंटित करती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर आग बुझाने के लिए बुनियादी इंतजाम भी नजर नहीं आ रहे हैं।
मानसून आते ही वन विभाग की सक्रियता बढ़ जाती है। लक्ष्य दिया जाता है—लाखों पौधे लगाने का। बजट जारी होता है—लाखों-करोड़ों रुपयों का। एक-एक पौधे की खुदाई, खाद, ट्री-गार्ड और रखरखाव के नाम पर सरकारी खजाने से पानी की तरह पैसा बहाया जाता है।
लेकिन जैसे ही बारिश का मौसम खत्म होता है, ये ‘सरकारी पौधे’ भी गायब हो जाते हैं।
एक पौधे को लगाने और बचाने की लागत कागजों पर सैकड़ों रुपये दिखाई जाती है
जिसके बाद हर तरफ के जंगलों को आग के हवाले कर दिया जाता है जिससे छोटे बड़े पेड़ झाड़ सब जल के राख हो जाते है।
- अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन इन लापरवाह अधिकारियों पर कोई कड़ा कदम उठाएगा, या फिर इसी तरह बांदे का हरा-भरा जंगल राख के ढेर में तब्दील होता रहेगा?







