
पिल्खाभूमि:जिला बलरामपुर के अंतर्गत वन विभाग में विगत वर्षों के दौरान हुए निर्माण कार्यों और वित्तीय स्वीकृतियों को लेकर एक बड़ा प्रामाणिक खुलासा होने जा रहा है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आधिकारिक और ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेजों से यह साफ हो रहा है कि धरातल पर तो कार्य हुआ है लेकिन विभाग के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है।
उच्च अधिकारी को 15 दिन पहले भेजा गया था स्मरण पत्र, गायब रिकॉर्ड की आशंका हुई सच साबित
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब विभाग द्वारा यह बात सामने आई कि संबंधित कार्यों के महत्वपूर्ण रिकॉर्ड उनके पास उपलब्ध नहीं हैं। गौरतलब है कि सजग पत्रकारिता और आरटीआई विशेषज्ञता का परिचय देते हुए मनीष वैद्य जी द्वारा ठीक 15 दिन पूर्व ही इस संबंध में विभाग के उच्च अधिकारी को एक औपचारिक स्मरण पत्र प्रेषित किया गया था। इस पत्र में महत्वपूर्ण रिकॉर्ड्स के गायब होने या उन्हें खुर्द-बुर्द किए जाने की गंभीर आशंका जताई गई थी। उच्च अधिकारी को समय रहते पत्र भेजे जाने के बावजूद विभाग का वर्तमान रवैया और रिकॉर्ड्स का न होना अब मनीष वैद्य जी द्वारा जताए गए अंदेशे को शत-प्रतिशत सच साबित कर रहा है। विभाग के शीर्ष स्तर को सूचित किए जाने के बाद भी शासकीय दस्तावेजों का इस तरह गायब होना या रिकॉर्ड न मिलना सीधे तौर पर एक गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और उच्च स्तरीय जांच का विषय है।

नियमों को ताक पर रखकर 30 दिनों तक सोता रहा विभाग, धारा 6(3) का खुला उल्लंघन
इस पूरे प्रकरण में विभाग का गैर-जिम्मेदाराना रवैया तब और उजागर हो गया, जब लंबे समय बाद अब यह तर्क दिया जा रहा है कि मांगी गई जानकारी उनके विभाग की नहीं है। यहाँ यह बड़ा विधिक सवाल उठता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी 30 दिनों तक गहरी नींद में सो रहे थे?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(3) के तहत यह स्पष्ट नियम है कि यदि कोई आवेदन किसी अन्य विभाग से संबंधित हो, तो उसे अधिकतम 5 दिनों के भीतर सही विभाग को अंतरित (Transfer) करना अनिवार्य होता है। ऐसे में 5 दिन के इस अनिवार्य नियम को ठेंगा दिखाकर पूरे 30 दिनों का समय क्यों लिया गया? अंत में इस तरह का बहाना बनाना सीधे तौर पर आवेदक को भटकाने, समय बर्बाद करने और सच को दबाने की सोची-समझी प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, जो राज्य सूचना आयोग और उच्च स्तरीय जांच के दायरे में आता है।

भ्रामक जानकारियों ने बढ़ाई जिम्मेदार अधिकारियों की मुश्किलें
पिलखाभूमि टीम से जुड़े सूत्रों के अनुसार, जिला बलरामपुर के इस मामले में विभाग के कुछ पूर्व और वर्तमान अधिकारियों द्वारा आरटीआई के आवेदनों पर अत्यंत भ्रामक, अधूरी और विरोधाभासी जानकारियां प्रदान की गई हैं। नियमानुसार, शासकीय दस्तावेजों की सुरक्षा में लापरवाही और आरटीआई के तहत भ्रामक जानकारी देना सीधे तौर पर सेवा नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जाता है। इस ऑन-रिकॉर्ड लापरवाही के कारण अब वर्तमान में पदस्थ अधिकारियों की संयुक्त जवाबदेही भी तय होने की कगार पर है।
सिविल सेवा नियमों के तहत सीधे राजधानी में शिकायत की तैयारी
विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विधिक विशेषज्ञों (Legal Team) की देखरेख में इस पूरे मामले का एक विस्तृत शिकायती ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। इस शिकायत को सीधे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियमों के सुसंगत प्रावधानों के तहत विभाग के सर्वोच्च मुख्यालय (रायपुर) और संबंधित मंत्रालय को भेजने की पूरी तैयारी है। विधिक टीम दस्तावेजों की अंतिम स्क्रूटनी कर रही है ताकि कोई भी तकनीकी खामी न रहे।

जल्द होगा चेहरों का सिलसिलेवार प्रामाणिक खुलासा
इस पूरे मामले पर समाचार पत्र और न्यूज़ पोर्टल की टीम लगातार नजर बनाए हुए है। विभागीय प्रक्रियाओं, गायब रिकॉर्ड्स और वित्तीय स्वीकृतियों में हुई इस पूरी गड़बड़ी का सिलसिलेवार और प्रामाणिक ब्यौरा बहुत जल्द पाठकों के सामने रखा जाएगा। विधिक प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही इस मामले से जुड़े जिम्मेदार चेहरों और उनकी संयुक्त जवाबदेही को भी सार्वजनिक किया जाएगा।













