
पिलखाभूमि अंबिकापुर/ शहर का फेफड़ा कहे जाने वाले संजय पार्क से आज जो खबर निकलकर आई है, उसने मानवता और प्रशासन दोनों को शर्मसार कर दिया है। जहाँ वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के दावे किए जाते थे, उसी बाड़े के भीतर आवारा कुत्तों ने 15 मासूम हिरणों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया।
यह कोई सामान्य हादसा नहीं बल्कि वन विभाग की लापरवाही का जीता-जागता खूनी सबूत है।
बाड़ा सुरक्षित या सिर्फ दिखावा?
सवाल यह उठता है कि आखिर वो सुरक्षा घेरा किस काम का जिसे आवारा कुत्तों का एक झुंड आसानी से भेद गया?
01- क्या प्रशासन चैन की नींद सो रहा था जब कुत्तों का झुंड बाड़े में कत्लेआम मचा रहा था?
02-क्या बाड़े की दीवारें और जालियां सिर्फ कागजों पर मजबूत थीं?
अंधेरे में सिस्टम, खून से सनी जमीन
हैरानी की बात है कि 15 हिरणों के शिकार में घंटों का समय लगा होगा, लेकिन पार्क की रखवाली करने वाले एक भी जिम्मेदार को इसकी भनक तक नहीं लगी। क्या नाइट गार्ड सिर्फ हाजिरी भरने के लिए हैं? शहर में आवारा कुत्तों का आतंक इस कदर बढ़ चुका है कि अब बेजुबान वन्यजीव भी अपने ही ‘घर’ (संरक्षण केंद्र) में सुरक्षित नहीं हैं।
जवाबदेही किसकी?
हर बार ऐसी घटनाओं के बाद जाँच की कागजी खानापूर्ति होती है लेकिन खोए हुए वन्यजीव वापस नहीं आते।
01- नगर निगम आवारा कुत्तों पर लगाम लगाने में नाकाम है।
02-वन विभाग अपने बाड़ों को सुरक्षित रखने में अक्षम है।
कड़वा सच: अगर हम बाड़े के अंदर बंद 15 हिरणों को नहीं बचा सकते, तो खुले जंगलों में वन्यजीव संरक्षण की बातें करना बेमानी है।






