सूरजपुर (छत्तीसगढ़)
हमारे समाज के कुछ परिवारों की उदारता और संस्कारों की जितनी तारीफ की जाए, कम ही होगी। जयनगर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम संजयनगर से एक ऐसा हृदयस्पर्शी मामला सामने आया है, जहां एक पिता अपनी औकात से बढ़कर दान-दहेज और मोटरसाइकिल तो दे चुका था, मगर दामाद जी के 3 लाख रुपयों का ‘मामूली’ सा अतिरिक्त नजराना समय पर नहीं चुका पाया। नतीजा? 9 माह के गर्भ से जूझ रही एक बेटी को इस नश्वर संसार से ही हमेशा के लिए ‘मुक्त’ कर दिया गया! अब उस बदकिस्मत पिता की नासमझी तो देखिए, वह पुलिस के चौखट पर माथा टेककर इस ‘पारिवारिक भेंट’ को दहेज हत्या का नाम दे रहा है।
ससुराल का ‘अगाध प्रेम’: चलती बाइक से फेंकने के बाद भी मायके ने ‘समझा-बुझाकर’ लौटा दिया था
शिकायतकर्ता तपन मंडल (निवासी ग्राम रविन्द्रनगर) के अनुसार, उनकी पुत्री निकीता बाईन का विवाह 02 जनवरी 2022 को संजयनगर निवासी आकाश बाईन के साथ पूरे हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था। दांपत्य जीवन ने तीन साल का एक मासूम फूल भी दिया। मगर दामाद जी और उनके परिजनों के ‘उच्च विचार’ इतने पर शांत नहीं हुए। आरोप है कि शादी के ठीक एक साल बाद से निकीता पर 3 लाख रुपये नकद लाने का दबाव बनाते हुए नियमित रूप से ‘शारीरिक साधना’ (मारपीट) शुरू कर दी गई।

ससुराल वालों के प्रेम का आलम यह था कि एक बार निकीता को चलती मोटरसाइकिल से सड़क पर धक्का देकर गिरा दिया गया, जिससे वह लहूलुहान हो गई। मगर हमारे पंच-परमेश्वरों और समाज के रहनुमाओं की छद्म-महानता देखिए—उन्होंने बैठकी की, समझाइश दी और दामाद जी के “अब नहीं मारूंगा” वाले पावन वचन पर भरोसा करके बेटी को दोबारा उसी भट्टी में झोंक दिया!
फांसी का ‘सस्ता नाटक’ और लावारिस लाश का सलीका
आरोपों के मुताबिक, 17 सितंबर 2026 को जब निकीता 9 माह के पूर्ण गर्भ से थी, तब ससुराल पक्ष ने अपनी ‘कलाकारी’ का सबसे वीभत्स प्रदर्शन किया। मायके वालों को बड़े सलीके से फोन पर इत्तला दी गई कि ‘आपकी बेटी ने फांसी लगा ली है और वह लाइफ लाइन अस्पताल अंबिकापुर में भर्ती है’। जब बेबस पिता दौड़ता हुआ अस्पताल पहुंचा, तो वहां कोई नहीं मिला। बाद में जिला अस्पताल अंबिकापुर के मुर्दाघर की दहलीज पर 9 माह की गर्भवती बेटी का बेजान शरीर मिला—पूरी तरह लावारिस, अकेला!

दामाद और उनका पूरा कुनबा अस्पताल से ऐसे नदारद था, मानो उनका मृतका से जन्म-जन्मांतर का कोई वास्ता ही न रहा हो। पिता का साफ दावा है कि निकीता के हाथ और शरीर के विभिन्न अंगों पर बेरहमी से पीटे जाने के ताजा जख्म चीख-चीख कर कह रहे थे कि फंदा गले में खुद नहीं डाला गया, बल्कि सांसें पहले ही छीन ली गई थीं।

संपादकीय टिप्पणी: धन्य हैं हमारे पंच और बलिहारी है खाकी की सुस्ती!
हम नतमस्तक हैं उन सामाजिक पंचायतों के आगे, जिनके लिए एक औरत की रोज होने वाली पिटाई महज ‘घर-गृहस्थी का मनमुटाव’ होती है। वाह रे समझौता कराने वाले मूकदर्शकों! क्या अब उस 9 माह के अजन्मे बच्चे की मौत की सुपारी का श्रेय भी आप लोग आपस में बांटेंगे?
और धन्य है हमारी जांच व्यवस्था की ‘अति-संवेदनशीलता’! एक नौ माह की गर्भवती महिला की संदिग्ध मौत हो जाती है, शरीर पर गंभीर चोटों के निशान मिलते हैं, और ‘मासूम’ ससुराल वाले अपनी अर्धांगिनी का शव अस्पताल में बेसहारा फेंककर फरार हो जाते हैं। इतनी ‘मासूमियत’ देखने के बाद भी यदि पुलिस प्रशासन केवल कागजों पर तारीखें दर्ज कर रहा है, तो फिर थानों के बाहर लगे न्याय के बोर्ड हटाकर ‘औपचारिकता केंद्र’ लिख देना चाहिए।
यदि एक बेबस पिता के लिखित आवेदन और प्रत्यक्ष चोटों के साक्ष्य के बाद भी कानून के हाथ आरोपियों के गिरेबान तक पहुंचने में ‘शुभ मुहूर्त’ का इंतजार कर रहे हैं, तो फिर यह मान लेना चाहिए कि व्यवस्था केवल पीड़ितों को धैर्य का उपदेश देने के लिए बची है।

सिस्टम और समाज की अंतरात्मा से 4 चुभते सवाल
- शव को लावारिस छोड़कर भागने की ‘मजबूरी’ क्या थी?: यदि निकीता ने वाकई आत्महत्या की थी, तो 9 माह की गर्भवती पत्नी की लाश को अस्पताल में बेसहारा छोड़कर पति और ससुराल के लोग किस ‘तपस्या’ में लीन होने भाग गए? क्या बेगुनाही का यही आचरण होता है?
- चोटों के निशान किस ‘अवसाद’ की देन हैं?: मृतका के शरीर और हाथों पर मौजूद बर्बर मारपीट के जख्मों पर क्या डॉक्टर और पुलिस पर्दा डालेंगे या मेडिकल बोर्ड की वीडियोग्राफी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएगी?
- हत्या या आत्महत्या—तय कौन करेगा?: स्थानीय लोगों के अनुसार जिसे किसी ने फंदे पर लटकते नहीं देखा, उस मामले में ससुराल पक्ष के मनगढ़ंत बयान को ही सच मानकर FIR दर्ज करने में देरी क्यों की जा रही है?
- अजन्मे बच्चे की सांसों का गुनहगार कौन?: मां के साथ पेट में दम तोड़ने वाले 9 माह के अजन्मे शिशु की मौत की जवाबदेही कानून किस खाते में दर्ज करेगा?
कानूनी अस्वीकरण (Legal Disclaimer):
यह समाचार पूर्णतः जयनगर थाने (सूरजपुर, छ.ग.) में मृतका के पिता तपन मंडल द्वारा प्रस्तुत लिखित शिकायत पत्र (दिनांक 19/09/2026) एवं परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित है। हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की सामाजिक छवि को धूमिल करना नहीं, बल्कि जनहित और निष्पक्ष पत्रकारिता के तहत मामले के तथ्यों और पीड़ित पक्ष की पीड़ा को प्रशासन के संज्ञान में लाना है। भारतीय न्याय व्यवस्था के सिद्धांत अनुसार, न्यायालय अथवा सक्षम जांच एजेंसी द्वारा दोष सिद्ध होने तक सभी अनावेदक/आरोपी कानूनन निर्दोष माने जाते हैं। मामले की निष्पक्ष जांच और अंतिम कानूनी निष्कर्ष पुलिस एवं न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। इस मामले में संबंधित अनावेदक पक्ष या पुलिस प्रशासन अपना पक्ष रखने के लिए सादर आमंत्रित है।





