
पिलखा भूमि बलरामपुर। छत्तीसगढ़ सरकार जहाँ एक ओर वर्तमान में ‘सुशासन त्योहार’ मनाकर जन-समस्याओं के त्वरित निराकरण और पारदर्शी प्रशासन का दावा कर रही है, वहीं बलरामपुर वन विभाग में जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है। विभाग की कार्यप्रणाली में भ्रष्टाचार उजागर करने के उद्देश्य से लगाए गए 20 आरटीआई आवेदनों के बाद अब साक्ष्यों को मिटाने और रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ किए जाने की प्रबल आशंका गहरा गई है। हैरानी की बात यह है कि सुशासन के इन दिनों में भी डीएफओ (DFO) बलरामपुर का मौन रहना सरकार की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
फाइलों पर मंडरा रहा खतरा
शासन के निर्देशानुसार सुशासन के दौरान लंबित प्रकरणों का निराकरण पारदर्शिता से होना चाहिए। किंतु बलरामपुर वन विभाग में 18 अप्रैल 2026 को लगाए गए 20 आरटीआई आवेदनों पर पारदर्शी कार्रवाई करने के बजाय फाइलों में हेराफेरी की संभावना बनी हुई है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, विभाग के भीतर कुछ अधिकारियों द्वारा साक्ष्यों को नष्ट करने हेतु दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ करने की साजिश रची जाने की आशंका है।

स्मरण पत्र के बाद भी अधिकारी क्यों हैं मौन?
रिकॉर्ड्स के साथ संभावित छेड़छाड़ की इसी आशंका को देखते हुए मनीष वैद्य द्वारा 4 मई 2026 को ही डीएफओ बलरामपुर को एक औपचारिक स्मरण पत्र प्रेषित किया गया था। पत्र में आग्रह किया गया था कि साक्ष्यों की सुरक्षा हेतु संबंधित फाइलों को तत्काल सील (Seal) किया जाए। लेकिन कई दिन बीत जाने और वर्तमान में प्रदेश में सुशासन त्योहार चलने के बावजूद डीएफओ कार्यालय ने रिकॉर्ड सुरक्षित करने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। क्या बलरामपुर वन विभाग के लिए सुशासन के मायने केवल कागजी घोषणाओं तक सीमित हैं?

बाबू का मैसेज और रसीद का प्रमाण
मामला तब और संदिग्ध हो गया जब मनीष वैद्य द्वारा संपर्क करने पर विभाग के संबंधित बाबू ने मैसेज के जरिए यह बताया कि “आपका डाक हमारे शाखा में रिसीव नहीं हुआ है।” जबकि मनीष वैद्य के पास पत्र की सफल डिलीवरी की कोरियर रसीद मौजूद है। जहाँ प्रदेश सरकार ‘त्वरित जवाबदेही’ की बात कर रही है, वहीं डीएफओ कार्यालय का एक कर्मचारी लिखित प्रमाण होने के बावजूद डाक प्राप्ति को नकार रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि विभाग के भीतर जानबूझकर जानकारी को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।

अगले अंक में होगा बड़ा खुलासा
आरटीआई कानून और सुशासन के नियमों को दरकिनार कर जिस तरह से साक्ष्यों को खतरे में डाला गया है, उससे विभाग की मंशा पर सवाल उठना लाजिमी है। मनीष वैद्य द्वारा पूर्व में भेजे गए स्मरण पत्र पर डीएफओ बलरामपुर अब क्या आदेश जारी करते हैं और फाइलों को सुरक्षित करने के लिए उनके द्वारा क्या कदम उठाए जाते हैं, इसे हम अपने अगले अंक में प्रमुखता से प्रकाशित करेंगे। विभाग की चुप्पी भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की ओर इशारा कर रही है, जिसे साक्ष्यों के साथ बेनकाब किया जाएगा।













