
15 दिन पूर्व स्मरण पत्र देने के बावजूद गहरी नींद में सोया रहा वन विभाग; सूचना कानून की धारा 6(3) का खुला उल्लंघन, पूर्व रेंजर साहू के दावों पर ‘पिलखा भूमि’ ने वर्तमान रेंजर वर्मा से मांगा था विधिक खंडन, शाम 4:00 और 5:00 बजे की दोनों समय-सीमाएं बीतने पर भी अधिकारियों ने साधी चुप्पी, अब सीधे राजधानी रायपुर में होगी शिकायत।
पिलखाभूमि बलरामपुर /राजपुर : छत्तीसगढ़ के राजपुर वन परिक्षेत्र के अंतर्गत वन विभाग में विगत वर्षों के दौरान हुए निर्माण कार्यों और वित्तीय स्वीकृतियों को लेकर एक बड़ा प्रामाणिक खुलासा होने जा रहा है। ‘पिलखा भूमि’ द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत प्राप्त आधिकारिक और ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेजों से यह साफ हो गया है कि धरातल पर तो कार्यों की स्वीकृतियां हुईं, लेकिन विभाग के पास उनका कोई पुख्ता रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
📌 15 दिन पूर्व भेजा गया था स्मरण पत्र, आशंका हुई सच साबित
सजक पत्रकारिता की प्रामाणिकता और आरटीआई विशेषज्ञता का परिचय देते हुए ‘पिलखा भूमि’ के प्रधान संपादक मनीष वैद्य जी द्वारा ठीक 15 दिन पूर्व ही इस संबंध में विभाग के उच्च अधिकारी को एक औपचारिक स्मरण पत्र प्रेषित किया गया था। इस पत्र में महत्वपूर्ण रिकॉर्ड्स के गायब होने या उन्हें खुर्द-बुर्द किए जाने की गंभीर आशंका जताई गई थी।

उच्च अधिकारी को समय रहते सचेत किए जाने के बावजूद विभाग का वर्तमान रवैया और रिकॉर्ड्स का न मिलना अब मनीष वैद्य जी द्वारा जताए गए अंदेशे को शत-प्रतिशत सच साबित कर रहा है। विभाग के शीर्ष स्तर को सूचित किए जाने के बाद भी शासकीय दस्तावेजों का इस तरह गायब होना सीधे तौर पर एक गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और उच्च स्तरीय जांच का विषय है।

📌 नियमों को ताक पर रखकर 30 दिनों तक सोता रहा विभाग, धारा 6(3) का खुला उल्लंघन
इस पूरे प्रकरण में विभाग का गैर-जिम्मेदाराना रवैया तब और उजागर हो गया, जब लंबे समय बाद अब अधिकारियों द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि मांगी गई जानकारी उनके विभाग की नहीं है। यहाँ यह बड़ा विधिक सवाल उठता है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी 30 दिनों तक गहरी नींद में सो रहे थे?
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(3) के तहत यह स्पष्ट नियम है कि यदि कोई आवेदन किसी अन्य विभाग से संबंधित हो, तो उसे अधिकतम 5 दिनों के भीतर सही विभाग को अंतरित (Transfer) करना अनिवार्य होता है। ऐसे में 5 दिन के इस अनिवार्य नियम को ठेंगा दिखाकर पूरे 30 दिनों का समय क्यों लिया गया? अंत में इस तरह का बहाना बनाना सीधे तौर पर आवेदक को भटकाने, समय बर्बाद करने और सच को दबाने की सोची-समझी प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, जो सीधे राज्य सूचना आयोग के दायरे में आता है।

📌 पूर्व रेंजर साहू जी ने जवाबदेही से पल्ला झाड़ा, कहा—”चार्ज दे चुका हूँ, वर्तमान रेंजर से बात करें” इस गंभीर मामले में जब ‘पिलखा भूमि’ संस्थान द्वारा विधिक नियमों के तहत पूर्व वन परिक्षेत्र अधिकारी श्री महाजन लाल साहू से उनका आधिकारिक पक्ष मांगा गया, तो उन्होंने लिखित माध्यम से अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया। पूर्व रेंजर साहू जी ने अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि वे वर्तमान जनसूचना अधिकारी को प्रभार (Charge) सौंप चुके हैं। उनका कहना है कि आपके सूचना के अधिकार (RTI) की पूरी जवाबदेही वर्तमान रेंजर वर्मा जी की है, उन्हीं से बात कर लें; उनके पास कोई रिकॉर्ड कैसे रह सकता है।
📌 साहू जी के दावों पर घिरे रेंजर वर्मा; संस्थान द्वारा खंडन हेतु दिए गए नोटिस पर भी साधी चुप्पी
मामले में नया और गंभीर विधिक मोड़ तब आया जब पूर्व रेंजर साहू जी द्वारा लगाए गए इन आरोपों और तर्कों के बाद, ‘पिलखा भूमि’ के प्रधान संपादक मनीष वैद्य ने पत्रकारिता के सर्वोच्च सिद्धांतों का पालन करते हुए वर्तमान परिक्षेत्र अधिकारी वर्मा जी को एक नया आधिकारिक पत्र (प्रेस लेटर संख्या: PB/NEWS/2026/05-92, दिनांक: 26 मई 2026) जारी किया।

इस पत्र के माध्यम से रेंजर वर्मा को साफ तौर पर अवगत कराया गया कि पूर्व अधिकारी साहू जी ने लिखित में रिकॉर्ड की पूरी विधिक जवाबदेही आपके (वर्मा जी के) सिर मढ़ दी है। चूंकि दोनों पक्षों के बयानों में भारी प्रशासनिक और विधिक विसंगति है, इसलिए संस्थान ने रेंजर वर्मा को इस विषय पर अपना विधिक खंडन या पक्ष रखने के लिए आज दिनांक 26 मई 2026 को शाम 4:00 बजे तक का विधिक समय दिया था। अत्यंत चौंकाने वाला विषय है कि इस गंभीर विधिक विसंगति पर और पूर्व रेंजर द्वारा खुद को जिम्मेदार ठहराए जाने के बावजूद वर्तमान रेंजर वर्मा जी ने शाम 4:00 बजे तक अपना कोई खंडन या विधिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। दोनों ही अधिकारियों की यह स्थिति दर्शाती है कि विभाग के भीतर ही रिकॉर्ड की कस्टडी को लेकर पल्ला झाड़ने और सच को छुपाने का खेल चल रहा है।
📌 पारिवारिक गमी पर दिखाया था मानवीय दृष्टिकोण; बढ़ी हुई अंतिम समय-सीमा भी हुई समाप्त
इससे पूर्व, विभाग की ओर से ‘पारिवारिक गमी’ (शोक) होने की दुखद सूचना मिलने पर ‘पिलखा भूमि’ के प्रधान संपादक मनीष वैद्य ने खोजी पत्रकारिता में सर्वोच्च मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए आधिकारिक पत्र (प्रेस संदर्भ क्रमांक: PB/2026/OFF-08) के माध्यम से दोनों अधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिए दिनांक 26 मई 2026 को शाम 5:00 बजे तक की अंतिम समय-सीमा भी प्रदान की थी।

अत्यंत खेद का विषय है कि संस्थान द्वारा विधिक निष्पक्षता और मानवीय आधार पर दी गई ये दोनों समय-सीमाएं (शाम 4:00 बजे और शाम 5:00 बजे) अब पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। पूर्व रेंजर द्वारा जिम्मेदारी टालने और वर्तमान रेंजर वर्मा द्वारा अपने ऊपर लगे आरोपों पर भी मौन साध लेने से अब यह साफ प्रमाणित हो गया है कि आरटीआई के पुख्ता दस्तावेजों के आगे किसी भी अधिकारी के पास अपनी बेगुनाही का कोई वैधानिक सबूत शेष नहीं है। इसी विधिक विसंगति और मौन को आधार मानते हुए अब इस खबर को प्रमुखता से लाइव किया गया।
🏛️ Civil सेवा नियमों के तहत सीधे राजधानी रायपुर में शिकायत की तैयारी
शासकीय दस्तावेजों की सुरक्षा में लापरवाही, उन्हें गायब करना, आरटीआई के तहत भ्रामक जानकारी देना और मीडिया के विधिक नोटिसों की अवहेलना करना छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियमों का गंभीर उल्लंघन है। विधिक विशेषज्ञों की देखरेख में इसका एक विस्तृत शिकायती ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है।

संस्थान द्वारा दी गई दोनों समय-सीमाएं बीत जाने के बाद, ‘पिलखा भूमि’ अब इस गंभीर मामले को लेकर आरटीआई से प्राप्त सभी प्रमाणित दस्तावेजों, गायब रिकॉर्ड्स की सूची, दोनों अधिकारियों के विरोधाभासी बयानों और उनकी विधिक अवज्ञा की पूरी रिपोर्ट साक्ष्यों के साथ प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) रायपुर, वन मंत्री और जिला कलेक्टर को औपचारिक रूप से सौंपने जा रही है। इसका उद्देश्य पूरे परिक्षेत्र के वित्तीय घपलों की उच्च स्तरीय दंडात्मक जांच कराकर कड़ी प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित कराना है। इस मामले से जुड़े जिम्मेदार चेहरों की संयुक्त जवाबदेही को बहुत जल्द सिलसिलेवार ढंग से सार्वजनिक किया जाएगा।












